Thursday, May 18, 2023

SHEKHAWATI TRAVELL - SALASAR BALAJI - 4

SHEKHAWATI TRAVELL - SALASAR BALAJI - 4

इससे पहले का यात्रा वृत्तान्त पढने के लिए क्लिक करे..(SHEKHAWATI TRAVELLS - KHATU TO JIN MATA - 3)

जीन माता के दर्शन के बाद हम लोग सालासर बालाजी के लिए चल पड़े. करीब ७५ किलोमीटर का रास्ता पड़ता हैं. हमें २ घंटे लगने थे. राजस्थान में वंहा की सरकार ने लोकल सडको  पर भी टोल टेक्स लगा रखा हैं. यात्रियों को लुटने की कोई कसर बाकी नहीं हैं.  रास्ते में गाडी का टायर बर्स्ट होने के कारण और ज्यादा समय लग गया. तीन बजे के करीब हम लोग सालासर बालाजी पहुंचे.  आज ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं थी. मंगल और शनिवार व रविवार के दिन ज्यादा भीड़ रहती हैं. गाडी पार्किंग में पार्क   करके हम लोग बैटरी की रिक्शा से मंदिर की और चल पड़े. मंदिर पहुंचकर पहले प्रसाद लिया फिर सालासर बालाजी के दर्शन किये.  

सालासर बालाजी भगवान हनुमान के भक्तों के लिए एक धार्मिक स्थल है। यह राजस्थान के चुरू जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग 668 पर स्थित है। वर्ष भर में असंख्य भारतीय भक्त दर्शन के लिए सालासर धाम जाते हैं। हर वर्ष चैत्र पूर्णिमा और आश्विन पूर्णिमा पर बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है। भारत में यह एकमात्र बालाजी का मंदिर है जिसमे बालाजी के दाढ़ी और मूँछ है। बाकि चेहरे पर राम भक्ति में राम आयु बढ़ाने का सिंदूर चढ़ा हुआ है। हनुमान सेवा समिति, मंदिर और मेलों के प्रबन्धन का काम करती है। यहाँ रहने के लिए कई धर्मशालाएँ और खाने-पीने के लिए कई जलपान-गृह (रेस्तराँ) हैं। श्री हनुमान मंदिर सालासर कस्बे के ठीक मध्य में स्थित है। वर्त्तमान में सालासर हनुमान सेवा समिति ने भक्तों की तादाद बढ़ते देखकर दर्शन के लिए अच्छी व्यवस्था की है। मान्यता है की बालाजी महाराज सभी इच्छाओं को पूरी करते है!

सालासर कस्बा,राजस्थान के चूरू जिले का एक हिस्सा है और यह जयपुर - बीकानेर राजमार्ग पर स्थित है। यह सीकर से 57 किलोमीटर, सुजानगढ़ से 24 किलोमीटर और लक्ष्मणगढ़ से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सालासर कस्बा सुजानगढ़ पंचायत समिति के अधिकार क्षेत्र में आता है और राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम की नियमित बस सेवा के द्वारा दिल्ली, जयपुर और बीकानेर से से जुड़ा हुआ है। इंडियन एयरलाइंस और जेट एयर सेवा जो जयपुर तक उड़ान भरती हैं,यहाँ से बस या टैक्सी के द्वारा सालासर पहुँचने में 3.5 घंटे का समय लगता है। सुजानगढ़, सीकर, डीडवाना, जयपुर और रतनगढ़ सालासर बालाजी के नजदीकी रेलवे स्टेशन हैं।

यह शहर पिलानी शहर से लगभग 140 किलोमीटर की दूरी पर है,जहाँ (बिड़ला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान, पिलानी/बिड़ला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान) स्थित है।

श्रावण शुक्लपक्ष नवमी,संवत् 1811 -दिन शनिवार को एक चमत्कार हुआ। नागौर जिले में असोटा गाँव का एक गिन्थाला-जाट किसान अपने खेत को जोत [खेत का काम] रहा था। अचानक उसके हल से कोई पथरीली चीज़ टकरायी और एक गूँजती हुई आवाज पैदा हुई। उसने उस जगह की मिट्टी को खोदा और उसे मिट्टी में सनी हुई दो मूर्त्तियाँ मिलीं। उसकी पत्नी उसके[किसान] लिए भोजन लेकर वहाँ पहुँची। किसान ने अपनी पत्नी को मूर्त्ति दिखायी। किसान की पत्नी ने अपनी साड़ी (पोशाक) से मूर्त्ति को साफ किया| यह मूर्त्ति बालाजी भगवान श्री हनुमान की थी। उन्होंने समर्पण के साथ अपने सिर झुकाये और भगवान बालाजी की पूजा की। भगवान बालाजी के प्रकट होने का यह समाचार तुरन्त असोटा गाँव में फ़ैल गया। असोटा के ठाकुर ने भी यह खबर सुनी। बालाजी ने उसके सपने में आकर उसे आदेश दिया कि इस मूर्त्ति को चूरू जिले में सालासर भेज दिया जाए। उसी रात भगवान हनुमान के एक भक्त, सालासर के मोहन दासजी महाराज ने भी अपने सपने में भगवान हनुमान यानि बालाजी को देखा। भगवान बालाजी ने उसे असोटा की मूर्त्ति के बारे में बताया। उन्होंने तुरन्त आसोटा के ठाकुर के लिए एक सन्देश भेजा। जब ठाकुर को यह पता चला कि आसोटा आये बिना ही मोहन दासजी को इस बारे में थोड़ा-बहुत ज्ञान है, तो वे चकित हो गये। निश्चित रूप से, यह सब सर्वशक्तिमान भगवान बालाजी की कृपा से ही हो रहा था। मूर्त्ति को सालासर भेज दिया गया और इसी जगह को आज सालासर धाम के रूप में जाना जाता है। दूसरी मूर्त्ति को इस स्थान से 25 किलोमीटर दूर पाबोलाम (जसवंतगढ़) में स्थापित कर दिया गया। पाबोलाव में सुबह के समय समारोह का आयोजन किया गया और उसी दिन शाम को सालासर में समारोह का आयोजन किया गया।

श्री हनुमान जन्मोत्सव का उत्सव हर साल चैत्र शुक्ल चतुर्दशी और पूर्णिमा को मनाया जाता है। श्री हनुमान जयन्ती के इस अवसर पर भारत के हर कोने से लाखों श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं।

आश्विन शुक्लपक्ष चतुर्दशी और पूर्णिमा को मेलों का आयोजन किया जाता है और बड़ी संख्या में भक्त इन मेलों में भी पहुँचते हैं। भाद्रपद शुक्लपक्ष चतुर्दशी और पूर्णिमा पर आयोजित किये जाने वाले मेले भी बाकी मेलों की तरह आकर्षक होते हैं। इन अवसरों पर नि:शुल्क भोजन, मिठाईयों और पेय पदार्थों का वितरण किया जाता है।

सालासर बालाजी मंदिर का रखरखाव मोहनदास जी ट्रस्ट के द्वारा किया जाता है। सालासर ट्रस्ट सालासर कस्बे के लिए काफी सुविधाएँ उपलब्ध कराती है, जैसे मंदिर के जेनरेटर से कस्बे में बिजली उपलब्ध करायी जाती है, फ़िल्टर किया हुआ साफ़ पानी कस्बे के लोगों के लिए उपलब्ध कराया जाता है।

मंदिर में अन्दर दर्शन के लिए जाते हुए 

श्री बालाजी महाराज 




बालाजी मंदिर में सत्संग भवन 

मंदिर का प्रांगन 




हमारी गुडिया बेटी 


मंदिर का प्रवेश द्वार 


बाबा के दर्शन के बाद मंदिर के बाहर आकर के राजस्थानी कढ़ी कचोडी और चाय का आनंद लिया और थोडा बहुत बाज़ार में घुमे.

मंदिर  के बाहर चौराहा 

सालासर में और भी बहुत सारे मंदिर हैं. उनका भी दर्शन किया 

श्री राम जानकी मंदिर 

भगवान् श्री राम जानकी 

हनुमान जी की माता जी का मंदिर भी सालासर में बाहर की और स्थित हैं. इस मंदिर के भी दर्शन किये.

अंजनी माता का मंदिर

सालासर में स्थित अंजनी माता का प्रसिद्ध मंदिर केवल राजस्थान ही नहीं पूरे भारत के श्रद्धालुओं का प्रमुख तीर्थस्थल है। श्री अञनी माता का मन्दिर सालासर धाम से लक्षमनगढ जाने वाली रोड पर लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस मंदिर में माँ की जो मूर्ति स्थापित है उसमें हनुमानजी अपने बालरूप में माता की गोद में बैठे हैं। अपने चतुर्भुजी आदमकद रूप में अंजनी माता शंख और सुहाग-कलश धारण किए हैं यहां एक साथ ही बालाजी हनुमान और उनकी माँ अंजनी की पूजा-अर्चना की जा सकती है। कहते है कि जो सालासर आकर इन दोनों की सच्चे मन से पूजा-अर्चना करता है। उसकी प्रत्येक मनोकामना पूरी होती है।

मन्दिर के संस्थापक श्री पन्नारामजी पारीक थे। इनकी पत्नि का युवावस्था में निधन हो गया। फ़िर वह प्रयाग चले गये और वहाँ गंगा तट पर ध्यान व पूजन अर्चन करने लगे। एक दिन हनुमानजी ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर, स्वप्न में दर्शन दे कर आदेश दिया कि तुम मेरे धाम सालासर आ जाओ। सालासर धाम में वह परोपकारी भावना से प्रेरित होकर पथिकों को शीतल जल पिलाकर उनकी थकान को मिटाने लगे। साथ ही वे अंजनीनन्दन व अंजनीमाता की सेवा भक्तिभाव से करते हुये उनके ही ध्यान में निमग्न रहने लगे। सन्१९६३ में सीकर नरेश ने पन्डित जी के कहे अनुसार मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया। अंजनी माता मंदिर की विशेष प्रसिद्धि सुहागन स्त्रियों और नवविवाहितों की मनोकामना सिद्धि लिए है। सुहागन स्त्रियां यहां आकर अपने वैवाहिक और पारिवारिक जीवन की सफलता के लिए नारियल और सुहाग चिन्ह चढ़ाती हैं।

दूर-दूर से लोग विवाह का पहला निमंत्रण पत्र मंदिर में जमा करते हैं। ताकि अंजनी माता की कृपा से न केवल विवाह सफल हो बल्कि नवविवाहित को सभी प्रकार का सुख मिले।

माँ अंजनी माता का मंदिर 

अंजनी माता 

अंजनी माता मंदिर का मुख्य द्वार 

श्री तिरुपति बालाजी मंदिर 

तिरुपति मंदिर के अन्दर 

अंजनी माता मंदिर 

राम जानकी मंदिर 

अंजनी माता मंदिर के पास ही श्री चमेलीदेवी अग्रवाल ट्रस्ट ने हनुमान जी की बहुत विशाल प्रतिमा, बगीचा, मंदिर और बहुत ही शानदार धर्मशाला बनवाई हुई हैं.  वाकई पुरे मारवाड़ में वैश्य बनिया समुदाय द्वारा एक से एक मंदिर व धर्मशालाए बनवाई हुई हैं. ये हमारे लिए गर्व की बात हैं.

हनुमान जी 



धर्मशाला व मंदिर 

चमेली देवी सभागार व उद्यान 

हनुमान जी के चरणों में भक्त प्रवीण 

सालासर में बहुत सारा समय बिताने के बाद हम लोग रानी सती झुंझनु की और चल पड़े.

यंहा से आगे का यात्रा वृत्तान्त पढने के लिए क्लिक करे...(SHEKHAWATI TRAVELL - RANI SATI JHUNJHNU - 5)

Wednesday, May 17, 2023

SHEKHAWATI TRAVELLS - KHATU TO JIN MATA - 3

SHEKHAWATI TRAVELLS - KHATU TO JIN MATA - 3

इससे पहले का यात्रा वृत्तान्त पढने के लिए क्लिक करे..(SHEKHAWATI TRAVELL - KHATUSHYAM JI YATRA - 2)

आज दिनांक १५ मार्च, २०२३ को खाटू श्याम जी से हम लोग सुबह नाश्ता करके जीन माता के लिए निकल पड़े. आज के दिन का हमारा सबसे पहले पडाव सबसे पहले जीन माता, फिर सालासर बालाजी, और सबसे आखिर में रानी सती  झुंझनु था. जीन माता खाटू श्याम जी से करीब २० किलोमीटर हैं. जीन माता जाने के लिए सारा रास्ता शुष्क और छोटी छोटी पहाडियों से भरा हुआ था. जीन माता पहुचने के बाद हम लोग गाडी से उतरकर दर्शन के लिए चल पड़े. मंदिर एक ऊँची पहाड़ी की तलहटी में स्थित हैं. पहाड़ी के ऊपर भी एक मंदिर हैं. पर एक तो गर्मी और फिर समय ना होने के कारण हम लोग ऊपर मंदिर पर नहीं गए. नीचे माता के मुख्य मंदिर में जाकर के दर्शन किये. यंहा पर मंदिर व एक छोटा सा गाँव हैं. जिसमे कुछ धर्मशालाए, प्रसाद की दुकाने व खाने पीने की दुकाने बनी हुई हैं. 

जीन  माता 

जीण माता राजस्थान के सीकर जिले में स्थित धार्मिक महत्त्व का एक गाँव है। यह सीकर से २९ किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यहाँ की कुल जनसंख्या ४३५९ है। यहाँ पर श्री जीण माता जी (शक्ति की देवी) का एक प्राचीन मन्दिर स्थित है। जीणमाता का यह पवित्र मंदिर सैकड़ों वर्ष पुराना माना जाता है। राजस्थान की राजधानी जयपुर से 108 किलोमीटर है.

मंदिर का इतिहास

लोक मान्यताओं के अनुसार जीवण का जन्म चौहान वंश के राजपूत परिवार में हुआ। उनके भाई का नाम हर्ष था। जो बहुत खुशी से रहते थे। एक बार जीवण का अपनी भाभी के साथ विवाद हो गया और इसी विवाद के चलते जीवण और हर्ष में नाराजगी हो गयी। इसके बाद जीवण आरावली के 'काजल शिखर' पर पहुँच कर तपस्या करने लगीं। मान्यताओं के अनुसार इसी प्रभाव से वो बाद में देवी रूप में परिवर्तित हुई। जीवण ने यहाँ जयंती माताजी की तपस्या की और जीण माताजी के नाम से पूजी जाने लगी। यह मंदिर चूना पत्थर और संगमरमर से बना हुआ है। यह मंदिर आठवीं सदी में निर्मित हुआ था। जीणमाता राजस्थान, भारत के सीकर जिले में धार्मिक महत्व का एक गांव है। यह दक्षिण में सीकर शहर से 29 किमी की दूरी पर स्थित है। शहर की आबादी 4359 है जिसमें से 1215 अनुसूचित जाति और 113 एसटी लोग हैं। श्री जीणमाता जी (शक्ति की देवी) को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। जीण माता जी का पवित्र मंदिर माना जाता है कि यह एक हजार साल पुराना है। लाखों भक्त यहां नवरात्रि के दौरान चैत्र और अश्विन के महीने में दो बार एक रंगीन त्यौहार के लिए इकट्ठा होते हैं। बड़ी संख्या में आगंतुकों को समायोजित करने के लिए कई धर्मशालाएं हैं। इस मंदिर के करीब ही उसके भाई हर्ष भैरवनाथ मंदिर पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। जीण माताजी मंदिर के पट कभी बंद नहीं होते हैं। ग्रहण में भी माई की आरती सही समय पर होती हैं।

जीण माताजी मंदिर रेवसा गांव से 10 किमी पहाड़ी के पास स्थित है। यह घने जंगल से घिरा हुआ है। उसका पूर्ण और वास्तविक नाम जयंतलाल था। इसके निर्माण का वर्ष ज्ञात नहीं है, लेकिन सर्वमण्डपा और खंभे निश्चित रूप से बहुत पुरानी हैं।

जीण माताजी का मंदिर शुरुआती समय से तीर्थ यात्रा का स्थान था और इसकी मरम्मत और कई बार पुनर्निर्माण किया गया था। एक लोकप्रिय मान्यता है जो सदियों से लोगों तक आती है कि चुरु के एक गांव घांघू में राजा गंगोसींघजी ने इस शर्त पर ऊर्वशी (अप्सरा) से शादी कर ली, कि वह अपने महल में पूर्व सूचना के बिना नहीं जाएंगे। राजा गंगोसींघजी को एक पुत्र मिला जिसे हर्ष कहा जाता था और एक बेटी जीवण थी। बाद में उसने फिर से कल्पना की लेकिन मौके के तौर पर यह राजा गंगोसींघजी अपने पूर्वजों को बिना बताए महल में गये और इस तरह उन्होंने अप्सरा से किए गए प्रतिज्ञा का उल्लंघन किया। तुरन्त उसने राजा को छोड़ दिया और अपने बेटे हर्ष और बेटी जीवण को भगा लिया, जिसे वह उस जगह पर छोड़ दिया जहां वर्तमान में मंदिर खड़ा है। यहां दो बच्चों ने अत्यधिक तपस्या का अभ्यास किया । बाद में एक चौहान शासक ने उस जगह पर मंदिर बनाया। इस मंदिर में अनगिनत चमत्कार देखें व महसूस किए जाते हैं। रोज सुबह माई को मदिरा का भोग लगाया जाता है और बडे चाव से मैया उसको स्वीकार करती है। मदिरा भोग लगाते ही गायब हो जाता है और आज तक किसी को पता नहीं चला कि मदिरा जाता कहा है। इसके अलावा मीठे चावल का भोग भी माई को लगाया जाता है।

जीण माता के मुख्य अनुयायियों में क्षेत्र के सैनी, यादव (अहिर), ब्राह्मण, राजपूत, गुर्जर समाज के गौत्र लादी, अग्रवाल, जंजीर और मीना और माहेश्वरी  बानियां शामिल हैं। जीण माता, सैनी, यादव (अहिर), अग्रवाल, स्वर्णकार,मीना, शेखावाती राजपूत (शेखावत और राव राजपूत) और राजसी के योद्धा वर्ग के जंगली, की कुलदेवी हैं। जीण माता के अनुयायियों मारवाड़ियो बनियों की एक बड़ी संख्या कोलकाता में रहते हैं, जो माई के मंदिर पर जाते रहते हैं। जो लोग जीण माताजी को अपनी मां के रूप में आदर करते हैं, उनके परिवार में नर बच्चे के जन्म के लिए प्रार्थना करते हैं और पुत्र के जन्म के बाद ही मंदिर की यात्रा करने का प्रतिज्ञा करते हैं। नर बच्चे के जन्म के बाद पूरे परिवार में जीण माता जी का दौरा किया जाता है और मंदिर के परिसर में पहले बाल काट (राजस्थानी में जडूला के रूप में जाना जाता है) की पेशकश की जाती है। अनुयायियों ने मंदिर में 50 किलो मिठाइयां, जो कि सवामणी के नाम से जानी जाती हैं, की पेशकश करती हैं।

मूगल सम्राट औरंगजेब माता के मंदिर के मैदान पर उतरना चाहता था। उसके पुजारियों द्वारा बुलाया जाने वाला, माता ने भैरों की अपनी सेना को छोड़ दिया (एक मक्खी परिवार की प्रजाति) जिसने सम्राट और उसके सैनिकों को अपने घुटनों पर लाया। उसने माफी मांगी और दयालु मातजी ने उसे अपने गुस्से से माफ़ किया। औरंगजेब ने अपने दिल्ली महल से अखण्ड (कभी-चमक) तेल का दीपक दान किया। माता के पवित्र संस्कार में यह दीपक अभी भी चमक रहा है। (विकिपीडिया)

मंदिर परिसर 

मंदिर परिसर 

मंदिर में जाने का मार्ग 

मंदिर का मुख्य द्वार 

जीन माता 

माता का दरबार 

माता के दर्शन किये. बहुत मानसिक संतोष मिला. और बहुत देर तक खड़े होकर माता के दर्शन करते रहे.
माता के दर्शन के बाद कुछ सीढ़िया चढ़कर भैरव मंदिर है, वंहा पर भैरव देव के दर्शन किये.

भैरव  मंदिर जाने का मार्ग 





श्री भैरव नाथ जी 

जीन माता मंदिर से दिखती घाटी 



मंदिर से बाहर आने का मार्ग 

मंदिर का बाज़ार 

जीन माता और भैरव नाथ के दर्शन के बाद हम लोग बस में बैठकर सालासर बालाजी के लिए निकल पड़े.

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Tuesday, May 16, 2023

SHEKHAWATI TRAVELL - KHATUSHYAM JI YATRA - 2

SHEKHAWATI TRAVELL - KHATUSHYAM JI YATRA - 2

इससे पहले का यात्रा वृत्तान्त पढने के लिए क्लिक करे..(SHEKHAWATI TRAVELLS - YATRA KHATU SHYAM JI -1 )

अपने होटल से हम लोग श्याम बाबा के दर्शन के लिए तोरण द्वार पर आ गए. यंहा से एक ध्वज पताका, जिसमे  एक नारियल बंधा हुआ होता हैं लेकर चलते हैं इसे निशान बोलते हैं. इसको श्याम बाबा के दरबार में चढाते हैं. यंहा से करीब एक डेढ़ किलोमीटर बाबा का मंदिर पड़ता हैं. मंदिर तक निशान को लेकर पैदल चलते है. और निशान को वंहा पर चढाते हैं.

तोरण द्वार पर श्रद्धालु निशान के साथ

तोरण द्वार 

तोरणद्वार पर मै निशान लिए हुए 

हम लोग पवित्र निशान को लेकर पैदल श्याम बाबा मंदिर की और चल पड़े . तोरण द्वार से मंदिर तक मार्ग में धर्मशालाए, होटल, बाज़ार आदि पड़ता है. बाज़ार में प्रसाद की दुकाने सजी हुई थी.

खाटू श्याम जी की कहानी:

भगवान कृष्ण ने दिया था कलियुग में पूजे जाने का वरदान

पौराणिक कथा के अनुसार, खाटू श्याम की अपार शक्ति और क्षमता से प्रभावित होकर श्रीकृष्ण ने इन्हें कलियुग में अपने नाम से पूजे जाने का वरदान दिया था।



खाटू श्याम जी को भगवान श्रीकृष्ण के कलयुगी अवतार के रूप में जाना जाता है। राजस्थान के सीकर जिले में स्थित श्याम बाबा के भव्य मंदिर में दर्शन के लिए हर दिन लाखों भक्त पहुंचते हैं। मान्यता है कि श्याम बाबा सभी की मनोकामनाएं पूरी करते हैं और फर्श से अर्श तक पहुंचा सकते हैं।

कौन हैं बाबा खाटू श्याम-

बाबा खाटू श्याम का संबंध महाभारत काल से माना जाता है। यह पांडुपुत्र भीम के पौत्र थे। पौराणिक कथा के अनुसार, खाटू श्याम की अपार शक्ति और क्षमता से प्रभावित होकर श्रीकृष्ण ने इन्हें कलियुग में अपने नाम से पूजे जाने का वरदान दिया था।

वनवास के दौरान जब पांडव अपनी जान बचाते हुए भटक रहे थे, तब भीम का सामना हिडिम्बा से हुआ। हिडिम्बा ने भीम से एक पुत्र को जन्म दिया जिसे घटोखा कहा जाता था। घटोखा से बर्बरीक पुत्र हुआ। इन दोनों को अपनी वीरता और शक्तियों के लिए जाना जाता था। जब कौरव और पांडवों के बीच युद्ध होना था, तब बर्बरीक ने युद्ध देखने का निर्णय लिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने जब उनसे पूछा वो युद्ध में किसकी तरह हैं, तो उन्होंने कहा था कि वो पक्ष हारेगा वो उसकी ओर से लड़ेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण युद्ध का परिणाम जानते थे और उन्हें डर था कि कहीं पांडवों के लिए उल्टा न पड़ जाए। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को रोकने के लिए दान की मांग की। दान में उन्होंने उनसे शीश मांग लिया। दान में बर्बरीक ने उनको शीश दे दिया, लेकिन आखिर तक उन्होंने युद्ध देखने की इच्छा जाहिर की।

श्रीकृष्ण ने इच्छा स्वीकार करते हुए उनका सिर युद्ध वाली जगह पर एक पहाड़ी पर रख दिया। युद्ध के बाद पांडव लड़ने लगे कि युद्ध की जीत का श्रेय किसे जाता है। तब बर्बरीक ने कहा कि उन्हें जीत भगवान श्रीकृष्ण की वजह से मिली है। भगवान श्रीकृष्ण इस बलिदान से प्रसन्न हुए और कलियुग में श्याम के नाम से पूजे जाने का वरदान दे दिया।

धीरे धीरे चलते हुए हम लोग मंदिर तक पहुँच गए. ज्यादा भीड़ नहीं थी. अब भीड़ का प्रबंधन भी बहुत अच्छे तरीके से होता हैं. लाइन में लगकर बाबा के दर्शन किये ,जल्दी नंबर आ गया था. बाबा का आशीर्वाद लेकर बाहर आगये. मंदिर के अन्दर के फोटो लेना मना हैं. जो ले सका वो ले लिए..

दर्शन के लिए लगी हुई पाइप लाइन 

दर्शन के लिए लाइन में सेल्फी लेता हुआ 

पवित्र मंदिर 

पवित्र मंदिर 


बाबा का मंदिर 

मंदिर से बाहर का दृश्य 

मंदिर के पीछे का दृश्य 

दिन में दर्शन करने के बाद हम लोग अपने कमरे में आ कर के सो गए. फिर शाम के समय बाबा के दर्शन के लिए गए.


मंदिर के अन्दर रात में 


रात के समय मंदिर का दृश्य 

एक सेल्फी तो बनती है.

मंदिर में रात के समय दर्शन करने क बाद हम लोग खाटू श्याम जी के दुसरे स्थलों की और गए. सबसे पहले श्याम बगीची में गए.

श्री श्याम वटिका  -  खाटू श्याम जी के निज मंदिर के बाई तरफ श्याम बगीची है | श्री श्याम भक्त आलू सिंह जी इसी बगीची के फूलो से श्याम बाबा का नित श्रींगार किया करते थे | इसी बगीची में श्री आलू सिंह जी की मूरत लगी हुई है जिस पर सभी श्याम भक्त अपना शीश झुकाने और दर्शन करने आते है | यंही पर आलू सिंह जी की समाधि भी हैं.

श्याम भक्त आलू सिंह जी 

बगीची के अन्दर 

बगीची में फव्वारा 

खाटू श्याम जी का बाज़ार 

बगीची के दर्शन के उपरान्त हम लोग बाज़ार से होते हुए श्याम कुंड की और आ गए. यंहा पर दो श्याम कुंड हैं. जिन्हें हर पंडित लोग असली वाला मानते हैं.

श्याम कुंड

श्री खाटू श्याम जी का शीश जिस धरा के भाग से अवतरित हुआ था वो श्याम कुंड के नाम से जाना जाता है। और ऐसा माना जाता है की इस कुंड में श्याम भक्त सच्चे मन से एक डुबकी लगा ले तो वो अपनी बुराइयों से दूर और अच्छे शरीर का धनि हो जाता है। इसलिए जब भी आपका खाटूश्याम जी बाबा श्याम के दर्शन करने जाना हो श्याम कुंड में दुबकी जरूर लगाना।

श्याम कुंड

श्याम कुंड



श्याम बाबा की महिमा लिखी हुई हैं.

यंही से थोड़ी दूर एक दुसरा भी कुंड हैं इस वाले को यंहा बैठे हुए पंडत असली वाला मानते हैं. पर यह बहुत छोटा और गंदा हैं. 



श्याम कुंड के पास बाबा की मूर्ति 



अरे ये लालाजी क्या बात कर रहे है बाज़ार में..

खाटू श्याम जी के विभिन्न स्थलों के दर्शन के बाद, भूख बहुत जोरो की लगी थी. खाना खाने के लिए दो तारीख वालो की धर्मशाला में आ गए. खाना खाकर अपने होटल में जाकर के सो गए. सुबह जीन माता के लिए निकलना था.

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