Sunday, July 8, 2012

यात्रा बद्रीनाथ धाम की

29th May 2010 को हम लोगो ने बदरीनाथ जाने का कार्यक्रम बनाया. मेरा और रवि का , दोनों का परिवार एक बोलेरो गाड़ी में बैठकर बदरीनाथ धाम के लिए निकल पड़े. हम लोग चरथावल से सुबह पांच बजे रवाना हुए. चरथावल से रोहाना होते हुए वाया छपार हम लोग हरिद्वार पहुँच गए. हरिद्वार से निकलकर पहला स्टे हमने देव प्रयाग में लिया. यंहा पर चाय पानी, नाश्ता आदि करके हमारा कारवा फिर से सफर के लिए चल पड़ा. दोपहर का भोजन हम लोगो ने रुद्रप्रयाग में किया. यंहा पर एक पेट्रोल पम्प पर अच्छा खाने का होटल बना हुआ हैं. रुद्रप्रयाग पार करने के बाद मौसम खराब होना शुरू हो गया था. जोरो से हवा चलने लगी थी. ऐसे ही मौसम में कर्णप्रयाग से होते हुए हम लोग जोशीमठ करीब सात बजे तक पहुँच गए थे. जोशीमठ पहुँचते पहुँचते जोरो से बारिश शुरू हो गई थी. मुख्य सड़क पर ही एक गेस्ट हाउस में दो कमरे लिए, और वंही पर रुक गए. थोड़ी देर आराम करके, बारिश रुकते ही भोजन के लिए चल दिए. जोशीमठ में तीन चार अच्छे भोजनालय हैं. खाना अच्छा बनता हैं. ऐसे ही एक होटल में खाने का आनंद लिया. बाहर मौसम बहुत सुहावना हो चुका था, ठंडी हवा चल रही थी. बाकी सब तो गेस्ट हाउस चले गए, मैं और नीलम थोड़ी देर जोशीमठ की सडको पर घूमते रहे. जब थक गए तो आकर के अपने कमरे में सो गए. सुबह जल्दी उठे, और तैयार होकर के पहले गेट की गाडियों की लाइन में लग गए. यंहा से बदरीनाथ जी तक गाडियो का वनवे यातायात रहता हैं. बीच में पांडुकेश्वर में रूट बदल जाता हैं. सुबह छः बजे पहला गेट खुलता हैं. करीब दो घंटे की यात्रा के बाद हम लोग बदरीनाथ जी पहुँच जाते हैं. हमारा गेस्ट हाउस बदरीनाथ जी में बस अड्डा पार करते ही थोडा आगे था. उसका नाम हैं नंदा गेस्ट हाउस. अब तक हम लोग बदरीनाथ जी करीब पांच बार जा चुके हैं. और हर बार इसी गेस्ट हाउस में ही रुकते हैं. अच्छा और सस्ता गेस्ट हाउस हैं. इसी के सामने एक भोजनालय भी बना हुआ हैं, वंहा पर खाने का आनंद लिया जा सकता हैं. इसी गेस्ट हाउस में गाड़ी को पार्क करने की भी सुविधा हैं. 

भगवान बदरीनाथ

बदरीनाथ धाम यानी कि भगवान विष्णु कि नगरी. बद्री धाम उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में स्थित हैं. बदरीनाथ विधानसभा क्षेत्र भी हैं. यह मंदिर भगवान विष्णु के बद्री रूप को समर्पित हैं. यंहा पर भगवान विष्णु अपनी पत्नी माता लक्ष्मी, गरुड़ जी, नारद जी, कुबेर जी, उद्धव जी आदि के साथ विराजमान हैं. इसे बद्रीश पंचायत कहा जाता हैं. बद्री का एक अर्थ बेर नामक फल भी होता हैं. कहते है यंहा पर कभी बेरी के वृक्षों कि बहुतायत थी. इसलिए इसे बदरीवन, बद्रिकाश्रम भी कहा जाता है. हम हिन्दुओ के ये चारधाम में एक माना जाता हैं. ऋषिकेश से यंहा कि दूरी करीब 295 किलोमीटर है.

मंदिर में भगवान नारायण कि पूजा होती हैं. और अखंड ज्योति जलती रहती हैं. भक्त लोग दर्शनों से पहले स्नान करते हैं. स्नान के लिए यंहा पर गर्म पानी के कुंड हैं, जिनसे चोबीस घंटे गर्म जल बहता हैं. गर्म जल और ठन्डे जल को मिलाकर एक अलग कुंड बनाया गया हैं, जिसमे भक्त जन स्नान करते हैं. गर्म जल के कुंड में जल इतना गर्म होता हैं कि उसमे चावल भी उबल जाता हैं. भगवान बद्री विशाल के प्रसाद में तुलसी कि माला, चने की दाल, मिस्री आदि का प्रसाद चढाया जाता हैं.

बद्री धाम को भोले शंकर महादेव कि नगरी भी कहा जाता हैं. कहा जाता हैं कि इस नगरी का निर्माण महादेव ने माता पार्वती के लिए किया था. पर ये नगरी भोले नाथ ने भगवान विष्णु को भेंट करदी थी.

भगवान बद्री कि मूर्ति काले शालिग्राम पत्थर से बनी हुई हैं. कहते हैं इस मूर्ति कि स्थापना देवताओं ने कि थी. इसके हजारो साल बाद आदि शंकराचार्य ने पुनः इसे नारद कुंड से निकालकर स्थापित किया था. मन्दिर में बदरीनाथ की दाहिनी ओर कुबेर की मूर्ति है। उनके सामने उद्धवजी हैं तथा उत्सवमूर्ति है। उत्सवमूर्ति शीतकाल में बरफ जमने पर जोशीमठ में ले जायी जाती है। उद्धवजी के पास ही चरणपादुका है। बायीं ओर नर-नारायण की मूर्ति है। इनके समीप ही श्रीदेवी और भूदेवी है।
भगवान् बद्री विशाल 
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह 12 धाराओं में बंट गई। इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई और यह स्थान बद्रीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना। भगवान विष्णु की प्रतिमा वाला वर्तमान मंदिर 3,133 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और माना जाता है कि आदि शंकराचार्य, आठवीं शताब्दी के दार्शनिक संत ने इसका निर्माण कराया था। इसके पश्चिम में 27 किमी की दूरी पर स्थित बद्रीनाथ शिखर कि ऊँचाई 7,138 मीटर है। बद्रीनाथ में एक मंदिर है, जिसमें बद्रीनाथ या विष्णु की वेदी है। यह 2,000 वर्ष से भी अधिक समय से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान रहा है।(साभार विकिपीडिया )
हमारा गेस्ट हाउस और पीछे पर्वतराज हिमालय 
इशांक बाबू 
पवित्र नीलकंठ शिखर 

नर और नारायण शिखर


हम लोग गेस्ट हाउस में थोड़ी देर आराम करके दर्शनों के लिए चले. सर्वप्रथम हमलोग तप्त कुंड की और स्नान के लिए गए. वंही पर प्रसाद की दुकाने भी स्थित हैं. प्रसाद की दूकान से बाल्टी और मग भी मिल जाता हैं. जिससे नहाने में आसानी होती हैं. हम लोगो ने अपना सामान प्रसाद की दूकान में रखा और स्नान के लिए चले गए. स्नान के बाद, तैयार होकर प्रसाद लेकर के, दर्शन के लिए लाइन की और बढ़ गए. लाइन देखकर हम लोग भोचक्के रह गए, करीब डेढ़ किलोमीटर लंबी लाइन लगी हुई थी. थोड़ी देर लाइन में लगकर जब ये लगा की चार या पांच घंटे से पहल्र दर्शन नहीं होगे तो बच्चो ने कुछ जुगाड लगाया, मंदिर के गेट पर खड़े सुरक्षा गार्डो के पास गए, उनसे बात की तब उन्होंने बच्चो पर दया करके हम लोगो को मंदिर के गेट के नजदीक लाइन में लगवा दिया, जिससे हमारा नंबर दर्शनों के लिए १५ - २० मिनट में आ गया.

मंदिर परिसर में अंदर दर्शनों के लिए धक्का मुक्की होती हैं. और बड़ी मुश्किलों से दर्शन होते हैं. भगवान बद्री विशाल के दर्शन करके दिल खुश हो गया. दर्शन करने के बाद हम लोग मंदिर से बाहर आ गए. 

आकाश में बादल मंडराने लगे थे. और बारिश होने की संभावना हो गयी थी. हम लोग वापिस अपने गेस्ट हाउस की ओर आ गए. बारिश जोरो से शुरू हो गयी थी. और चारों तरफ अन्धेरा सा छा गए था. हम लोगो का माना और कई जगह जाने का कार्यक्रम था. लेकिन उस दिन लगातार बारिश होती रही, और हमारे आगे के सारे प्रोग्राम रद्द हो गए. खाना हम लोगो ने गेस्ट हाउस में ही मंगा लिया था. मौसम में जबरदस्त ठण्ड हो गयी थी. इसलिए अपनी अपनी रजाइयो में दुबक कर सो गए.

अलकनंदा जी में पवित्र नारद कुंड
यही वह कुंड है  जिसमे  से आदि शंकराचार्य में भगवान बद्री विशाल कि मूर्ति को निकालकर स्थापित किया था.

मंदिर के सामने धर्मशाला 
रवि का परिवार 

इशांक और गाडी का ड्राईवर
हमारा परिवार 

सुन्दर बदरीनाथ  घाटी 

सुन्दर अति सुन्दर
बर्फ से ढकी चोटिया 
अलकनंदा जी पर बना लोहे का पुल
श्री बद्री विशाल के दर्शनों के लिए लगी भक्तो की पंक्ति..
वाह क्या स्टाइल हैं..
मंदिर के पीछे विशाल नारायण पर्वत
आश्रम और झरना 

सुबह जब सोकर के उठे तो बाहर निकलकर देखा, चारों तरफ पहाडिया बर्फ से लदी हुई थी. सारी रात बारिश और बर्फ बारी होती रही थी. मौसम बहुत ही सुहावना और ठंडा था. हल्का हल्का कोहरा छाया हुआ था. सुबह सुबह की चाय पीकर मन तारो ताज़ा किया. और नहा धोकर लौटने की तैय्यारी करने लगे. खैर ये धाम ऐसा है यंहा पर आकर के आदमी यंहा की घाटियों में खोकर रह जाते हैं. किसी हिल स्टेशन से भी खूबसूरत यंहा की घाटिया है. ये तो समय की कमी रहती हैं और वापिस लोटना पड़ता हैं. सुबह नो बजे हम लोग बद्रीनाथ धाम से रवाना हो गए. दोपहर २ बजे तक हम कर्णप्रयाग आ गए, वंहा पर संगम के किनारे एक होटल में दोपहर का भोजन किया, इस दौरान बारिश और आंधी तूफ़ान भी आ रहा था. मौसम बहुत अच्छा था.

सुबह सुबह बर्फ से ढकी चोटिया 

शिखरों पर पड़ी हुई ताज़ी बर्फ 

ऊपर बादल नीचे बर्फ 

पर्वत के पीछे उगते हुए भगवान् भास्कर 

एक और  दृश्य 

श्रीनगर

कर्ण प्रयाग में दोपहर का भोजन करके हम शाम छः बजे तक श्रीनगर पहुँच गए. और उस रात श्रीनगर में गढ़वाल मंडल विकास निगम के रिसोर्ट में हम लोग रुके थे. सौभाग्य से दो कमरे खाली मिल गए थे. रिसोर्ट के सामने ही एक अच्छा भोजनालय है, जिसमे अच्छा खाना मिलता हैं. श्रीनगर शहर माँ अलकनंदा नदी के किनारे स्थित एक सुन्दर नगर है. यह नगर पौड़ी गढ़वाल जिले में स्थित हैं.श्रीनगर गढ़वाल राजाओं की राजधानी रहा हैं. एक सुन्दर घाटी में श्रीनगर शहर बसा हुआ हैं. यंहा पर ठहरने और रहने के लिए अच्छे होटल और गेस्ट हाउस हैं. एक अच्छा विकसित बाजार यंहा पर है. अलकनंदा नदी के किनारे घूमने फिरने के लिए अच्छा पैदल ट्रेक और पार्क बना हुआ हैं. श्रीनगर शहर ५५० मीटर की ऊँचाई पर बसा हुआ हैं. यंहा से पौड़ी १८ किलोमीटर और ऋषिकेश १०८ किलोमीटर पड़ता हैं.
गढ़वाल मंडल गेस्ट हाउस 
श्रीनगर में एक बाँध भी बन रहा हैं. जिसके फोटो मैंने यंहा पर दिए हैं. बाँध का काम बहुत तेजी से चल रहा हैं. इस पर करीब 1000 MW का बिजली घर बनाया जा रहां है. इस बाँध का विरोध भी बहुत हो रहा हैं. जिसके बारे में आप लोगो ने समाचार पत्रों में भी पढ़ा होगा. लोगो को बिजली भी चोबीस घंटे चाहिए और बाँध का विरोध भी करते है.
माँ अलकनंदा जी के ऊपर बन रहा बाँध 

माँ अलकनंदा 
लोहे का झुला पुल 
गंगा जी के ऊपर बना हुआ यह लोहे का झूला पुल श्रीनगर शहर को गंगा पार के गावों से जोड़ता हैं. सुबह शाम यह पुल पर्यटकों के घूमने का स्थान है.
अलकनंदा जी के किनारे इशांक 

ऊपर पुल नीचे माँ गंगा 
सुबह  पांच बजे हम लोग सोकर के उठ गए. और चाय वाय पीकर  हम लोग हरिद्वार के लिए निकल पड़े. हरिद्वार में गंगा जी में स्नान करके हम लोग मुज़फ्फरनगर आ गए. वन्देमातरम 

Wednesday, July 4, 2012

माँ सुरकंडा देवी और धनौल्टी की यात्रा

माता सुरकंडा देवी मंदिर हम दो साल से लगातार जा रहे थे. पिछली बार एक मनौती मांगी थी, जो मैय्या ने पूरी कर दी थी, इसलिए पुरे परिवार के साथ माता के दर्शन के लिए चलने का कार्यक्रम बन गया. दस अप्रैल के दिन जाने का कार्यक्रम तय हुआ, एक अपनी बड़ी गाड़ी बलेरो और एक किराए की गाड़ी इंडिका विस्टा तय करली. मैं मुज़फ्फरनगर से सुबह चार बजे विस्टा को लेकर बच्चो के साथ अपने कस्बा चरथावल पहुँच गया. वंहा से बाकी परिवार के लोग बोलेरो गाड़ी लेकर के तैयार थे. वंहा से रोहाना, देवबंद, लखनौती चौराहा, इकबालपुर होते हुए पहला स्टे हमने बिहारी गढ़ में लिया. बिहारी गढ़ की चाय व मुंग की डाल के पकोडे बहुत मशहूर हैं. हर सरकारी बस व आने जाने वाली गाड़ी वंहा जरुर रूकती हैं, और यात्री गण लज़ीज़ पकोडो का आनंद लेते हैं. यंहा से चल कर हम डाट वाले मंदिर पर रुकते हैं और माता के दर्शन करते हैं. सुरंग को पार करके हम लोग दून घाटी मैं प्रवेश कर जाते हैं. और देहरादून नगर को पार कर के सीधे मसूरी मार्ग को पकड़ लेते हैं. चढाई शुरू होने से पहले मुख्य मार्ग पर ही प्रकाशेश्वर महादेव मंदिर पड़ता हैं. यह मंदिर बहुत ही शानदार बना हुआ हैं. यंहा पर चोबीस घंटे भंडारा चलता रहता हैं. हमने भी यंहा पर रूककर भंडारे का प्रसाद ग्रहण किया. यंहा पर कुछ भी दान चढाना बिलकुल मना हैं. और यह भंडारा कई साल से लगातार चल रहा हैं, सब प्रभु की कृपा है. 

श्री प्रकाशेश्वर महादेव मंदिर


मंदिर से हम लोग आगे की यात्रा पर निकल पड़े. मसूरी के रास्ते मैं सुन्दर पहाडिया व घाटिया पड़नी शुरू हो गयी थी. मसूरी से पांच किलोमीटर पहले नगरपालिका चेकपोस्ट पर हमारा झगड़ा पुलिस वालो से होते होते बचा. हम टैक्स की पर्ची कटवाने के लिए अपनी गाड़ी को रोक ही रहे थे की एक पुलिस वाले ने बोलेरो पर डंडा मार दिया. फिर क्या था सभी लोग गाड़ी से उतर कर उस पुलिस वाले से भिड गए. पुलिसवालों को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने फिर माफ़ी मांगी. पुलिस सब जगह एक सी होती हैं, उनमे मानवता नाम की कोई चीज नहीं होती हैं. खैर टैक्स जमा करने के बाद हम वंहा से निकले. मसूरी से चार किलोमीटर पहले एक रास्ता बांये को सीधे मसूरी चला जाता हैं, और दाई और से धनौल्टी, सुरकंडा देवी व चम्बा की और चले जाते हैं. यंहा से धनौल्टी २९ किलोमीटर व सुरकंडा देवी ३४ किलामीटर पड़ता हैं. मसूरी तक डबल रोड बनी हुई हैं, लेकिन यंहा से सिंगल रोड शुरू हो जाती हैं, लेकिन सड़क बहुत अच्छी बनी हुई हैं. 


सुन्दर पहाडिया


सुन्दर पहाडियों का व सफर का आनंद लेते हुए हम लोग आगे बढते रहे. आगे चलने पर एक छोटा सा होटल नज़र आया, यंह पर रूककर थोडा विश्राम किया, क्योंकि बच्चो को चक्कर आने लगे थे. यंह पर थोड़ी देर रुक कर चाय, ठंडा पीकर के हम लोग आगे चल पड़े.


सुन्दर दृश्य होटल का

इसी होटल के पास पहाड़ी पर एक सुन्दर मंदिर नज़र आया, हमने होटल वाले से उस मंदिर के बारे मैं पूछा तो उसने बताया की यह मंदिर छोटा सुरकंडा देवी का मंदिर हैं. हमने इस मंदिर को नीचे से ही शीश झुकाया.


छोटा सुरकंडा देवी मंदिर

इस स्थान से आगे निकलते ही घने बुरांश के और देव दार के जंगल शुरू हो जाते हैं. और गढ़वाल की ऊँची चोटियों के भी दर्शन हो सकते थे पर उस ओर कोहरा छाया हुआ था. यह क्षेत्र बुरांशखंडा के नाम से भी मशहूर हैं. बुरांश के पेड़ यंहा पर बहुतायत पाए जाते हैं. बुरांश का फूल उत्तराखंड का राजकीय फूल हैं. इससे जैम, जैली, शरबत, व विभिन्न आयुर्वेदिक दवाए बनायी जाती हैं. इन दिनों उत्तरखंड की पहाडिया इन फूलो से भरी रहती हैं. 


बुरांश के बाग़


बुरांश का वृक्ष

धनौल्टी होते हुए हमारी गाडिया कद्दु खाल पहुँच जाती हैं. कद्दु -खाल सुरकंडा देवी जाने के लिए बेस हैं. यंही से ही पैदल या घोड़े पर २ किलोमीटर की कड़ी चढाई होती हैं. गाडिया पार्क करके हम लोग चढाई शुरू कर देते हैं. मौसम बहुत ही सुहावना था, ना तो गर्मी थी ना ही ठंडा.

माँ सुरकंडा देवी

माँ सुरकंडा देवी का धाम जनपद टिहरी में स्थित हैं. यह स्थान धनौल्टी से आठ किलोमीटर हैं. चम्बा से बाईस किलोमीटर पड़ता हैं. इस धाम की समुद्र तल से ऊंचाई 2757 मीटर है. माता का धाम इस स्थान की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित हैं. यह स्थान चारों ओर से देवदार के जंगलो से घिरा हुआ हैं. माता के मंदिर से चारो तरफ सुन्दर और हसींन वादियों का बड़ा सुन्दर दृश्य दिखाई देता हैं. यदि मौसम साफ़ हो तो हरिद्वार, देहरादून, मसूरी, और बर्फ से ढंकी हिमालया की चोटिया साफ़ दिखाई देती हैं. यंहा के बारे मैं ये कहा जाता हैं की जब माता सती, दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे देती हैं. और भगवान शिव उनकी पार्थिव देह को उठा कर ब्रहमांड में घूमते हैं, तो भगवान विष्णु अपने सुदर्शन के द्वारा माता सती के ५१ अंश कर देते हैं, ये अंश हमारे आर्यावर्त में जंहा जंहा पर गिरे वंही पर शक्ति पीठ की स्थापना भगवान शिव ने की थी. यंहा पर माता का शीश गिरा था. हर शक्ति पीठ में माँ शक्ति के साथ साथ, भगवान शिव के अवतार भैरव भी स्थापित हैं. इन शक्ति पीठो के बारे में कहा जाता हैं की माता अपने भक्तो की सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं. बोलो जय माता की.




हमारी माताजी 



पिता श्री 

मंदिर तक पहुँचने तक आखिर की कठिन चढाई थका देती हैं. पर जैसे ही मंदिर के पास पहुँचते हैं मंदिर के दर्शन करके सारी थकान दूर हो जाती हैं.


सुरकंडा देवी की चढ़ाई 


मंदिर से पहले की कठिन चढ़ाई 


जय माता की


मंदिर परिसर में हमारे साथ एक अद्भुत वाकया हुआ, जब हम मंदिर पहुंचे तो उस समय मंदिर के कपाट बंद थे. करीब एक घंटे बाद द्वार खुलने थे. हमने पुजारी जी से दर्शन के लिए कहा, पुजारी जी बोले दर्शन तो अभी थोड़ी देर बाद हो पायेगे, आप लोग मेरे साथ यज्ञ कर लीजिए. पुजारी जी ने केवल हमारे परिवार को मंदिर में माता की मूर्ती के सामने बैठाया, और दरवाजे बंद करके यज्ञ शुरू कर दिया. कितना अद्भुत था माँ की शक्ति पीठ में माता के चरणों में बैठ कर हम लोग यज्ञ कर रहे थे और आहुति डाल रहे थे. यज्ञ पूरा होने के बाद हमने अपनी मनौती पूरी होने के उपलक्ष में माता को जोड़ा चढाया और भेंट चढाई. माता की मूर्ति का फोटो लेने नहीं देते हैं, इसलिए माता का चित्र मै यंहा पर नहीं दे पा रहा हूँ.


जैकारा वीर बजरंगे


हर हर महादेव


गढवाल की सुन्दर वादियां

आप इस ऊपर वाले चित्र को ध्यान से देखिये, नीचे दूर कद्दु खाल दिखाई दे रहा हैं, और साथ में पार्क की हुई गाडिया कितनी छोटी छोटी दिख रही हैं.


बच्चे मस्ती में


मंदिर का एक और दृश्य 
मंदिर परिसर में करीब दो घंटे बिताने के बाद हम लोग वापिस चल पड़े.


हमारा परिवार


माता का मंदिर का चित्र नीचे कद्दू खाल से 

कद्दू खाल में एक अच्छा रेस्टोरेंट बना हुआ हैं, उसमे खाना स्वादिस्ट बनता हैं. हम लोगो ने वंही पर खाने का आनंद लिया. खाना खाकर हम लोग धनौल्टी की और निकल पड़े.

धनौल्टी

धनौल्टी एक छोटा सा खूबसूरत, देवदार के जंगलो से घिरा हुआ हिल स्टेशन हैं. शांत, सुरम्य, मन को मोहने वाला, यंहा से दिखाई देने वाली हिमालय की बर्फीली चोटिया, बहुत ही सुन्दर दिखती हैं. यह स्थान भीड़ भाड से दूर, मन को सकून देने वाला स्थान हैं. मसूरी की भीड़ भाड़ से घबराकर जब पर्यटक यंहा पहुँचते हैं. तो उनका दिल खुश हो जाता हैं. यह स्थान मसूरी से काफी सस्ता भी हैं. यंहा के मुख्य आकर्षण यंहा पर स्थित दो इको पार्क हैं. यह पार्क पिकनिक के लिए एक आइडियल स्थान हैं. इस पार्क में घुसने से पहले टिकट लेना पड़ता हैं. एक ओर एक रेस्टोरेंट भी बना हुआ हैं, जिसमे खाने पीने का आनंद लिया जा सकता हैं. इस पार्क में बच्चो के लिए झूले, ओर राईडिंग बनी हुई हैं. जिस पर बच्चे अपना मनोरंजन कर सकते हैं. 


इको पार्क, धनौल्टी का मुख्य गेट


इको पार्क


पार्क के अन्दर बच्चे 


शानदार देवदार का जंगल 


पार्क में खूबसूरत पगडण्डी 


वन हमारे साथी 


पार्क में झूला 


देवदार के वृक्षों की गोद में एक होटल का सुन्दर दृश्य 


खूबसूरत कोहरे से ढंकी पहाडिया

धनौल्टी करीब दो ढाई घंटे घूमने के बाद हम लोग वंहा से चल दिए, मसूरी के बाहरो बाहर निकल कर हम लोग सीधे महादेव मंदिर पर आकार रुके, जंहा पर एक बार फिर भंडारे के प्रसाद, चाय और खिचड़ी का आनंद लिया. देहरादून से बाई पास होते हुए हम लोग हरिद्वार की और निकल गए. हरीद्वार में कुम्भ का मेला चल रहा था. सोचा इस बहाने कुम्भ में भी स्नान कर लिया जाए. हरिद्वार दुल्हन की तरह सजा हुआ था.हरिद्वार की मैं केवल एक तस्वीर डाल रहा हूँ. क्योंकि हरिद्वार ऋषिकेश यात्रा के बारे में में पहले अपनी पोस्ट में लिख चुका हूँ.


कुम्भ मेले में रात के समय सजा हुआ हर की पौड़ी, हरिद्वार

हर की पैडी पर स्नान करने के बाद, थोडा देर बाजार आदि में घूमने के बाद हम लोग करीब १२ बजे अपने क़स्बा चरथावल पहुँच गए.

धन्यवाद - वन्देमातरम