Friday, July 31, 2020

SHUKRATEERTH - भागवद तीर्थ की शुभ यात्रा

SHUKRATEERTH - भागवद तीर्थ की शुभ यात्रा 

शुक्रताल प्राचीन पवित्र तीर्थस्थल है। यह मुजफ्फरनगर के समीप स्थित है। यहाँ संस्कृत महाविद्यालय है। यह स्थान हिन्दुओं का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल माना जाता है। गंगा नदी के तट पर स्थित शुक्रताल जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कहा जाता है कि इस जगह पर अभिमन्यु के पुत्र और अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित - जिनको शाप मिला था कि उन्हें एक सप्ताह के अंदर तक्षक नाग द्वारा डस लिया जायेगा - ने महऋषि शुकदेव के श्रीमुख से भगवत कथा का श्रवण किया था। इसके समीप स्थित वट वृक्ष के नीचे एक मंदिर का निर्माण किया गया था। इस वृक्ष के नीचे बैठकर ही शुकदेव जी भागवत कथा सुनाया करते थे। ये वट वृक्ष यहाँ अभी भी विद्यमान है और आश्चर्य की बात है कि इस वृक्ष पर कभी पतझड़ नहीं आती। शुकदेव मंदिर के भीतर एक यज्ञशाला भी है। राजा परीक्षि‍त महऋषि जी से भागवत की कथा सुना करते थे। इसके अतिरिक्त यहां पर पर भगवान गणेश की 35 फीट ऊंची प्रतिमा भी स्‍थापित है। इसके साथ ही इस जगह पर अक्षय वट और भगवान हनुमान जी की 72 फीट ऊंची प्रतिमा बनी हुई है। श्री शिव भगवन की 108 फ़ीट ऊंची तथा माता दुर्गा की भी 80 फ़ीट ऊंची प्रतिमा यहाँ स्थापित की गई हैं।(साभार: विकिपीडिया)

श्रीराम मंदिर शुक्रताल 
स्वामी कल्यान् देव समाधि मंदिर 

हमारे प्रिय अरुण शर्मा जी अक्षय वट के नीचे 


भागवद मंदिर 


अक्षय वट के नीचे मै 


शुकदेव जी मंदिर 


भगवान् श्री कृष्ण 



अक्षय वट 
मंदिर से दीखते हनुमान जी 


मंदिर से दिखता एक नज़ारा 


मंदिर से दीखते श्री गणेश 
प्रभु श्रीराम दरबार 


प्रभु श्रीराम मंदिर
स्वामी कल्याण देव
निष्काम, कर्मयोगी, तप, त्याग और सेवा की साक्षात मूर्ति ब्रह्मलीन स्वामी कल्याण देव महाराज  का जन्म वर्ष 1876 में जिला बागपत के गांव कोताना में उनकी ननिहाल में हुआ थ । उनका पालन पोषण मुजफरनगर के अपने गांव मुंडभर में हुआ था । उन्हें वर्ष 1900 में मुनि की रेती ऋषिकेश में गुरूदेव स्वामी पूर्णानन्द जी सेे संन्यास की दीक्षा ली थी । अपने 129 वर्ष के जीवनकाल में उन्होनें 100 वर्ष जनसेवा में गुजारे । स्वामी जी ने करीब 300 शिक्षण संस्थाओं के साथ कृषि केन्द्रों, गऊशालाओं, वृद्ध आश्रमों, चिकित्सालयों आदि का निर्माण कराकर समाजसेवा में अपनी उत्कृष्ट छाप छोड़ी । 

ब्रह्मलीन स्वामी कल्याण देव जी के प्रमुख शिष्य एवं उत्तराधिकारी ओमानन्द ब्रचारी जी के अनुसार स्वामी कल्याणदेव जी को उनके समसाजिक कार्यों के लिये तत्कालीन राष्ट्रपति श्री नीलम संजीव रेड्डी जी ने 20 मार्च 1982 में पदमश्री से सम्मानित किया । इसके बाद 17 अगस्त 1994 को गुलजारी लाल नन्दा फाउंडेशन की ओर से तत्कालीन राष्ट्रपति डा0 शंकर दयाल शर्मा जी ने उन्हें नैतिक पुरूस्कार से सम्मानित किया । 30 मार्च 2000 को तत्कालीन राष्ट्रपति श्री के0आर0 नरायणन जी द्वारा पदमभूषण से सम्मानित किया गया । इसके बाद चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के दीक्षांत समारोह में उन्हें 23 जून 2002 को तत्कालीन राज्यपाल श्री विष्णुकांत शास्त्री जी ने साहित्य वारिधि डी–लिट उपाधि प्रदान की थी। 

स्वामी ओमानन्द के अनुसार ब्रह्मलीन स्वामी कल्याणदेव जी महाराज अपने जीवनकाल में कभी भी रिक्शा में नहीं बैठे । लखनऊ, दिल्ली रेलवे स्टेशनों पर जाकर भी वे हमेशा पैदल चला करते थे । उनका तर्क था कि रिक्शा में आदमी आदमी को खिंचता है । यह एक पाप है । 

पांच घरों से रोटी की भिक्षा लेकर एक रोटी गाय को दूसरी रोटी कूत्ते को तीसरी रोटी पक्षियों के लिये छत पर डालते थे । बची दो रोटियॉं को वह पानी में भिगोकर खाते थे ।

ब्रह्मलीन स्वामी कल्याण देव जी महाराज ने एक वर्ष पहले ही अपने शिष्य स्वामी ओमानंद महाराज को अपनी समाधि का स्थान बता दिया था । यहॉ तक की मृत्यु के तीन दिन पहले स्वामी जी ने अंतिम सांस लेने से दस मिनट पहले शुक्रताल स्थित मंदिर व वटवृक्ष की परिक्रमा की इच्छा जताई थी । उनकी इच्छानुसार उनके अनुयायियों ने ऐसा ही किया । इस दौरान भगवान श्रीकृष्ण का चित्र देखकर उनके चेहरे पर हंसी आ गई ।

ब्रह्मलीन स्वामी कल्याण देव महाराज जी ने अपने जीवनकाल में हमेशा जरूरतमंदो की मदद करने का संदेश दिया । वह कहा करते थे कि अपनी जरूरत कम करो । और जरूरत मंदो की हरसंभव मदद करों । परोपकार को ही वह सबसे बड़ा धर्म मानते थे । ऐसा उन्होंने जीवन पर्यन्त किया भी । सदैव पानी में भिगोकर भिक्षा में ली गई रोटी खाने वाले स्वामी जी ने 129 वर्ष की आयु में 300 से अधिक शिक्षा केन्द्र स्थापित कर रिकार्ड स्थापित किया । 




 स्वामी श्री ओमानंद जी-SWAMI OMANAND JI  

स्वामी ओमानंद जी ब्रह्म लीन स्वामी कल्यान् देव जी के प्रमुख शिष्य हैं.  स्वामी जी के बाद भाग्वाद्पीठ के प्रमुख वर्तमान में श्री ओमानंद जी हैं स्वामी ओमानंद जी भी स्वामी कल्यान् देव जी के पद चिन्हों पर चल रहे हैं. और धर्म समाज, व शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं 

भाग्वद्पीठ का मुख्य द्वार 


भागवद पीठ का संकेतक 


श्री गणेश जी 
गणेश धाम में गणेश जी की विशाल प्रतिमा स्थापित हैं जो की देखने योग्य हैं.

गणेश जी की प्रतिमा के बारे में जानकारी 

श्री हनुमद्धाम 

हनुमद्धाम में हनुमान जी की विशाल प्रतिमा स्थापित हैं. यंहा के संस्थापक व प्रमुख स्वामी केशवानंद जी हैं. 


हनुमद्धाम के बारे में 


हनुमद्धाम का मुख्य द्वार 


श्री हनुमान जी 
श्री गणेश धाम 

श्री हनुमान जी 

हनुमद्धाम का आँगन 

शुक्रताल का दृश्य 
 
पवित्र गंगा जी की धारा  
कारगिल शहीद स्मारक 

शुक्रतीर्थ में एक कारगिल शहीद स्मारक भी बना हुआ हैं. जिसका उद्घाटन भूतपूर्व उपराष्ट्रपति श्री भैरो सिंह शेखावत जी के द्वारा हुआ था. 


कारगिल स्मारक में  अन्दर का दृश्य 

कारगिल स्मारक में शहीद स्मारक 

यंहा पर कारगिल में शहीद हुए भारतीय सैनिको के नाम पत्थर पर खुदे हुए हैं. कारगिल का नक्षा, व अमर जवान का मोमेंटो यंहा पर स्थापित हैं. 


शिव धाम 

शुक्रतीर्थ में बहुत ही सुन्दर शिव धाम बना हुआ हैं. यंहा पर एक संस्कृत विद्यालय भी चलता हैं.


महादेव 


शिव धाम मंदिर 

शिव धाम 



शिव धाम में दो बाल ब्रह्मचारी 

गंगा किनारे घंटा घर 

शुक्रताल में आपका स्वागत हैं 

शुक्रताल से पहले एक मंदिर 

शुक्रतीर्थ का प्रवेशद्वार 

शुक्रतीर्थ में कुछ समय बिताने के बाद वापिस हम लोग अपने नगर आगये. एक दिन में ये छोटी सी यात्रा सम्पूर्ण हुई. 

Sunday, July 26, 2020

SHIRDI TRAVELL - सूरत से शिर्डी यात्रा -५- (नासिक-NASIK)

SHIRDI TRAVELL - सूरत से शिर्डी यात्रा -५- (नासिक-NASIK) 

इस यात्रा को आरम्भ से पढने के लिए क्लिक करिए."(शिर्डी साईं धाम यात्रा - १ (सूरत से शिर्डी )

इस यात्रा का इससे पहले का पार्ट पढने के लिए क्लिक करिए."(SHIRDI TRAVELL - सूरत से शिर्डी यात्रा - ४ (त्र्यम्बकेश्वर-TRIMBKESHWAR)

हम लोग त्रिम्ब्केश्वर से करीब २ बजे  आ गए थे. नासिक पहुँच कर लोकल के मंदिर व घाट देखने थे. हम लोग नासिक में ज्यादा कुछ तो देख नहीं पाए पर जो मुख्य मुख्य स्थान थे उनके दर्शन किये. इनमे में भी पंचवटी के दर्शन रह गए थे. पंचवटी में भगवान् राम, माता सीता व लक्ष्मण जी ने अपने वनवास का बहुत समय बिताया था. 

अब कुछ नासिक के बारे में. विकिपीडिया से साभार 

नासिक अथवा नाशिक भारत के महाराष्ट्र राज्य का एक शहर है। नसिक महाराष्ट्र के उत्तर पश्चिम में, मुम्बई से १५० किमी और पुणे से २०५ किमी की दुरी में स्थित है। यह शहर प्रमुख रूप से हिन्दू तीर्थयात्रियों का प्रमुख केन्द्र है। नासिक पवित्र गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 565 मीटर है। गोदावरी नदी के तट पर बहुत से सुंदर घाट स्थित है। इस शहर का सबसे प्रमुख भाग पंचवटी है। इसके अलावा यहां बहुत से मंदिर भी है। नासिक में त्योहारों के समय में बहुत अधिक संख्या में भीड़ दिखाई पड़ती है।

नाशिक शक्तिशाली सातवाहन वंश के राजाओं की राजधानी थी। मुगल काल के दौरान नासिक शहर को गुलशनबाद के नाम से जाना जाता था। इसके अतिरिक्त नाशिक शहर ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में भी अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर ने १९३२ में नाशिक के कालाराम मंदिर में अस्पृश्योंको प्रवेश के लिये आंदोलन चलाया था।

नाशिक में लगने वाला कुंभ मेला, जिसे यहाँ सिंहस्थ के नाम से जाना जाता है, शहर के आकर्षण का सबसे बड़ा केन्द्र है। भारतीय पंचांग के अनुसार सूर्य जब कुंभ राशी में होते है, तब इलाहाबाद में कुंभमेला लगता है और सूर्य जब सिंह राशी में होते है, तब नाशिक में सिंहस्थ होता है। इसे कुंभमेला भी कहते है। अनगिनत श्रद्धालु इस मेले में आते हैं। यह मेला बारह साल में एक बार लगता है। इस मेले का आयोजन महाराष्ट्र पर्यटन निगम द्वारा किया जाता है। भारत में यह धार्मिक मेला चार जगहों पर लगता है। यह जगह नाशिक, इलाहाबाद, उज्जैन और हरिद्वार में हैं। इलाहाबाद में लगने वाला कुंभ का मेला सबसे बड़ा धार्मिक मेला है। इस मेले में हर बार विशाल संख्या में भक्त आते हैं।

इस मेले में आए लाखों श्रद्धालु गोदावरी नदी में स्नान करते हैं। यह माना जाता है कि इस पवित्र नदी में स्नान करने से आत्मा की शुद्धि और पापों से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा प्रत्येक वर्ष आने वाले शिवरात्रि के त्योहार को भी यहां बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हजारों की संख्या में आए तीर्थयात्री इस पर्व को भी पूरे उमंग और उत्साह के साथ मनाते हैं।

इस त्योहार में आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए राज्य सरकार कुछ विशेष प्रकार का प्रबंध करती है। यहां दर्शन करने आए तीर्थयात्रियों के रहने के लिए बहुत से गेस्ट हाउस और धर्मशाला की सुविधा मुहैया कराई जाती है। यहां स्थित घाट बहुत ही साफ और सुंदर है। त्योहारों के समय यहां सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जाते हैं।(साभार: विकिपीडिया)

रामघाट व रामकुंड 
रामकुंड गोदावरी नदी पर स्थित है, जो असंख्य तीर्थयात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां भक्त स्नान के लिए आते हैं। अस्थि विसर्जन के लिये यह कुंड एक पवित्र स्थान माना जाता है। यह माना जाता है कि जब भगवान श्री राम नासिक आए थे तो उन्होंने यही स्नान किया था। यह एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है।

सबसे पहले हम लोग रामकुंड या रामघाट पहुंचे. मकर संक्रान्ति के कारण स्नान करने वालो की बहुत भीड़ थी. हमने केवल हाथ मुह धोये और पूजा की. 


रामकुण्ड



प्राचीन माँ गोदावरी मंदिर 

भक्तजन स्नान करते हुए 


रामघाट पर श्री कपालेश्वर मंदिर 

माँ सीता जी की गुफा की और जाने का संकेतक 

अलग अलग स्थानों को जाने का संकेतक 

काला राम मंदिर के बाहर प्रसाद की दुकाने 

श्री कालाराम मंदिर 
नासिक में भगवान् राम के दो प्रमुख मंदिर हैं एक हैं गोरा राम मंदिर, एक हैं काला राम मंदिर. गोरा राम मंदिर में भगवान् राम की सफ़ेद संगमरमर की प्रतिमा हैं. काला  राम मंदिर में काले रंग की प्रतिमा हैं. इसमें हमने काला राम मंदिर के दर्शन किये. व बाहर से फोटो लिए. गोरा राम मंदिर हम नहीं जा पाए. 

नाशिक में पंचवटी स्थित कालाराम मंदिर वहां के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। इस मंदिर का निर्माण गोपिकाबाई पेशवा ने १७९४ में करवाया था। हेमाडपंती शैली में बने इस मंदिर की वास्तुकला बहुत ही खूबसूरत है। इस मंदिर की वास्तुकला त्र्यंबकेश्वर मंदिर के ही सामान है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह मंदिर काले पत्थरों से बनाया गया है।(साभार: विकिपेडिया) 

मंदिरों के दर्शन करते हुए शाम हो चुकी थी. बहुत सी जगह हमारी देखने से रह गयी थी. हमारे पास समय भी नहीं था. बाकी के स्थान  फिर कभी के लिए छोड़ दी गयी. हम लोग भी थक चुके थे मैंने अपने साथ के लोगो को भरे मन से अलविदा कहा. . मुझे सूरत निकलना था. जिसके लिए द्वारका सर्किल से, शुभम ट्रावेल्स से बस पकडनी थी. मेरी आल रेडी सूरत तक की बुकिंग थी. कुल ५०० रूपये किराया था. ये बस शिर्डी से आती हैं वंही से बुक की हुई  बर्थ खाली आती हैं. रात दस बजे मेरी बस थी. मैं आठ बजे शुभम ट्रावेल्स द्वारिका सर्किल पर आ गया था. भूख  भी लग रही थी. अपना बैग शुभम पर रखकर कुछ खाने की तलाश में निकल पडा. थोड़ी ही दूर एक साउथ इंडियन डोसे वाला खड़ा था. मैंने भी एक मैसूर डोसा खाया. रेट कुल ४० रूपये था. बहत ही स्वादिष्ट डोसा था. पेट भर गया था. एक चाय सुड़क कर मैं वापिस अपने ठीये पर आ गया. रात दस बजे ठीक समय पर बस आयी. मैं बस में चढ़ गया. अपनी बर्थ पर पहुंचकर लम्बी तान कर सो गया. ठीक चार बजे बस सूरत पहुँच गयी. मैं उतरकर पैदल घूमता हुआ अपनी PG में पहुँच गया. ये यात्रा यंही समाप्त होती हैं, कोई भूल चूक या गलती हुई हो तो क्षमा करना. धन्यवाद  ॐ साईं राम.... 

Saturday, July 25, 2020

SHIRDI TRAVELL - सूरत से शिर्डी यात्रा - ४ (त्र्यम्बकेश्वर-TRIMBKESHWAR)

SHIRDI TRAVELL - सूरत से शिर्डी यात्रा - ४ (त्र्यम्बकेश्वर-TRIMBKESHWAR)

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिए क्लिक करिए "( शिर्डी साईं धाम यात्रा - १ (सूरत से शिर्डी )
इससे पहले का वृत्तान्त पढने  के लिए क्लिक करिए. "(सूरत से शिर्डी यात्रा -३ ( शनि शिन्गनापुर)


शिर्डी से नासिक के लिए मुझे जल्दी सुबह मुह अँधेरे निकलना था. सुबह चार बजे का अलार्म लगा कर सो गया. होटल वाले को भी बोल दिया की सुबह जल्दी निकलूंगा. रात को ही उसका हिसाब किताब कर दिया. सुबह चार बजे उठकर, हाथ मुह धोकर मैं तैयार हो गया. और बाहर निकल गया. नासिक के लिए गाड़ी थोड़ी ही दूर चलकर हाईवे से मिलनी थी. शिर्डी से नासिक ९० किलोमीटर हैं. १० मिनट में मै पैदल हाईवे पर पहुँच गया. वंहा एक चाय वाला खड़ा था. एक कप चाय और बंद लिया गया. इतने चाय पी, एक बस आती दिखाई दी. वह वंही पर आकर रुक गयी. बस उज्जैन से आ रही थी. कंडक्टर नासिक के लिए आवाज लगा रहा था. मैं उसमे चढ़ गया. स्लीपर AC कोच थी. कंडक्टर को किराए के १०० रूपये देकर में ऊपर स्लीपर में चढ़ गया. और लेट गया. AC के कारण झपकी आने लगी. करीब डेढ़ घंटे बाद कंडक्टर ने आवाज लगाई कि नासिक वाले तैयार हो जाओ. हम उठ गए. और वंहा के मशहूर द्वारिका सर्किल पर उतर गए. द्वारिका सर्किल नासिक का एक मशहूर चोराहा हैं. नासिक में आने जाने वाली बसे इसी चौराहे पर सवारी उतारती चढ़ाती हैं. सूरत से शिर्डी आने जाने वाली गाडिया यंही पर सवारी उतारती व चढ़ाती हैं. बस से उतरते ही हमें ऑटो वालो ने घेर लिया, मेरे साथ उज्जैन से आ रहे २ बन्दे और उतरे. क्षमा चाहूंगा उनका नाम और मोबाइल नंबर मेरे से खोये गए थे. नाम याद नहीं रहा. एक उनमे वंहा के डाक्टर थे. और एक उनके दोस्त. उन्हें भी त्रिम्बकेश्वर जाना था, व नासिक घूमना था. हम तीनो ने एक औटो पुरे दिन के लिए, त्रिम्ब्केश्वर व नासिक घुमने के लिए शेयरिंग में तय कर लिया. वह ८०० रूपये में तय हुआ था. उज्जैन वाले बंधू मृदुभाषी व सीधे साधे थे. सबसे पहले हमने ऑटो वाले से कहा की हमें फ्रेश होना हैं व नहाना धोना हैं. व रामघाट के पास स्थित एक सार्वजानिक स्नानघर में ले आया. आज मकर संक्रांति होने के कारण भीड़ बहुत थी. वैसे भी नासिक एक बहुत बड़ा तीर्थ स्थान हैं. हर बारह साल में कुम्भ का मेला भरता हैं. दक्षिण की गंगा माँ गोदावरी नासिक के बीचो बीच से बहती हैं. नहा धोकर हम लोग त्रिम्ब्केश्वर के लिए निकल पड़े. नासिक से त्रिम्ब्केश्वर करीब तीस किलोमीटर हैं. हाईवे के दोनों और अंगूरों के बाग़ लहलाते नज़र आते है. नासिक अंगूरों और अंगूरों की शराब के लिए प्रसिद्द हैं. अंगूरों के फार्म में ही वाईनरी नज़र आ रही थी. यानी अंगूर की शराब भी वंही बनती हैं साथ ही होटल और गेस्ट हाउस भी नज़र आ रहे थे. इन्ही अंगूर फार्म में हर्षद मेहता का फार्म भी जो की अब उसके परिवार वाले देखते हैं. खैर थोड़ा आगे चलकर एक सुन्दर व बड़ा सा भोजनालय नज़र आया. भोजनालय का नाम था संस्कृति.चाय पानी व नाश्ते की तलब लगी थी सो रुक गए. चाय पानी लेकर हम लोग फिर से चल पड़े. ऑटो वाला बहुत बातूनी था. सारे रास्ते बात करता चलता रहा.

अब कुछ त्रिम्ब्केश्वर के बारे में. (त्र्यम्बकेश्वर ज्योर्तिलिंग मन्दिर महाराष्ट्र-प्रांत के नासिक जिले में हैं यहां के निकटवर्ती ब्रह्म गिरि नामक पर्वत से गोदावरी नदी का उद्गम है। इन्हीं पुण्यतोया गोदावरी के उद्गम-स्थान के समीप असस्थित त्रयम्बकेश्वर-भगवान की भी बड़ी महिमा हैं गौतम ऋषि तथा गोदावरी के प्रार्थनानुसार भगवान शिव इस स्थान में वास करने की कृपा की और त्र्यम्बकेश्वर नाम से विख्यात हुए। मंदिर के अंदर एक छोटे से गंढे में तीन छोटे-छोटे लिंग है, ब्रह्मा, विष्णु और शिव- इन तीनों देवों के प्रतीक माने जाते हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्मगिरि पर्वत के ऊपर जाने के लिये चौड़ी-चौड़ी सात सौ सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। इन सीढ़ियों पर चढ़ने के बाद 'रामकुण्ड' और 'लष्मणकुण्ड' मिलते हैं और शिखर के ऊपर पहुँचने पर गोमुख से निकलती हुई भगवती गोदावरी के दर्शन होते हैं।

त्र्यंबकेश्‍वरज्योर्तिलिंग में ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश तीनों ही विराजित हैं यही इस ज्‍योतिर्लिंग की सबसे बड़ी विशेषता है। अन्‍य सभी ज्‍योतिर्लिंगों में केवल भगवान शिव ही विराजित हैं।

गोदावरी नदी के किनारे स्थित त्र्यंबकेश्‍वर मंदिर काले पत्‍थरों से बना है। मंदिर का स्‍थापत्‍य अद्भुत है। इस मंदिर के पंचक्रोशी में कालसर्प शांति, त्रिपिंडी विधि और नारायण नागबलि की पूजा संपन्‍न होती है। जिन्‍हें भक्‍तजन अलग-अलग मुराद पूरी होने के लिए करवाते हैं।

इस प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी अर्थात नाना साहब पेशवा ने करवाया था। इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1755 में शुरू हुआ था और 31 साल के लंबे समय के बाद 1786 में जाकर पूरा हुआ। कहा जाता है कि इस भव्य मंदिर के निर्माण में करीब 16 लाख रुपए खर्च किए गए थे, जो उस समय काफी बड़ी रकम मानी जाती थी।

गाँव के अंदर कुछ दूर पैदल चलने के बाद मंदिर का मुख्य द्वार नजर आने लगता है। त्र्यंबकेश्वर मंदिर की भव्य इमारत सिंधु-आर्य शैली का उत्कृष्ट नमूना है। मंदिर के अंदर गर्भगृह में प्रवेश करने के बाद शिवलिंग की केवल आर्घा दिखाई देती है, लिंग नहीं। गौर से देखने पर अर्घा के अंदर एक-एक इंच के तीन लिंग दिखाई देते हैं। इन लिंगों को त्रिदेव- ब्रह्मा-विष्णु और महेश का अवतार माना जाता है। भोर के समय होने वाली पूजा के बाद इस अर्घा पर चाँदी का पंचमुखी मुकुट चढ़ा दिया जाता है।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर और गाँव ब्रह्मगिरि नामक पहाड़ी की तलहटी में स्थित है। इस गिरि को शिव का साक्षात रूप माना जाता है। इसी पर्वत पर पवित्र गोदावरी नदी का उद्गमस्थल है। कहा जाता है-

प्राचीनकाल में त्र्यंबक गौतम ऋषि की तपोभूमि थी। अपने ऊपर लगे गोहत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए गौतम ऋषि ने कठोर तप कर शिव से गंगा को यहाँ अवतरित करने का वरदान माँगा। फलस्वरूप दक्षिण की गंगा अर्थात गोदावरी नदी का उद्गम हुआ।

गोदावरी के उद्गम के साथ ही गौतम ऋषि के अनुनय-विनय के उपरांत शिवजी ने इस मंदिर में विराजमान होना स्वीकार कर लिया। तीन नेत्रों वाले शिवशंभु के यहाँ विराजमान होने के कारण इस जगह को त्र्यंबक (तीन नेत्रों वाले) कहा जाने लगा। उज्जैन और ओंकारेश्वर की ही तरह त्र्यंबकेश्वर महाराज को इस गाँव का राजा माना जाता है, इसलिए हर सोमवार को त्र्यंबकेश्वर के राजा अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं।

इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना के विषय में शिवपुराण में यह कथा वर्णित है-

एक बार महर्षि गौतम के तपोवन में रहने वाले ब्राह्मणों की पत्नियाँ किसी बात पर उनकी पत्नी अहिल्या से नाराज हो गईं। उन्होंने अपने पतियों को ऋषि गौतम का अपमान करने के लिए प्रेरित किया। उन ब्राह्मणों ने इसके निमित्त भगवान्‌ श्रीगणेशजी की आराधना की।

उनकी आराधना से प्रसन्न हो गणेशजी ने प्रकट होकर उनसे वर माँगने को कहा उन ब्राह्मणों ने कहा- 'प्रभो! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो किसी प्रकार ऋषि गौतम को इस आश्रम से बाहर निकाल दें।' उनकी यह बात सुनकर गणेशजी ने उन्हें ऐसा वर माँगने के लिए समझाया। किंतु वे अपने आग्रह पर अटल रहे।

अंततः गणेशजी को विवश होकर उनकी बात माननी पड़ी। अपने भक्तों का मन रखने के लिए वे एक दुर्बल गाय का रूप धारण करके ऋषि गौतम के खेत में जाकर रहने लगे। गाय को फसल चरते देखकर ऋषि बड़ी नरमी के साथ हाथ में तृण लेकर उसे हाँकने के लिए लपके। उन तृणों का स्पर्श होते ही वह गाय वहीं मरकर गिर पड़ी। अब तो बड़ा हाहाकार मचा।

सारे ब्राह्मण एकत्र हो गो-हत्यारा कहकर ऋषि गौतम की भर्त्सना करने लगे। ऋषि गौतम इस घटना से बहुत आश्चर्यचकित और दुःखी थे। अब उन सारे ब्राह्मणों ने कहा कि तुम्हें यह आश्रम छोड़कर अन्यत्र कहीं दूर चले जाना चाहिए। गो-हत्यारे के निकट रहने से हमें भी पाप लगेगा। विवश होकर ऋषि गौतम अपनी पत्नी अहिल्या के साथ वहाँ से एक कोस दूर जाकर रहने लगे। किंतु उन ब्राह्मणों ने वहाँ भी उनका रहना दूभर कर दिया। वे कहने लगे- 'गो-हत्या के कारण तुम्हें अब वेद-पाठ और यज्ञादि के कार्य करने का कोई अधिकार नहीं रह गया।' अत्यंत अनुनय भाव से ऋषि गौतम ने उन ब्राह्मणों से प्रार्थना की कि आप लोग मेरे प्रायश्चित और उद्धार का कोई उपाय बताएँ।

तब उन्होंने कहा- 'गौतम! तुम अपने पाप को सर्वत्र सबको बताते हुए तीन बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करो। फिर लौटकर यहाँ एक महीने तक व्रत करो। इसके बाद 'ब्रह्मगिरी' की 101 परिक्रमा करने के बाद तुम्हारी शुद्धि होगी अथवा यहाँ गंगाजी को लाकर उनके जल से स्नान करके एक करोड़ पार्थिव शिवलिंगों से शिवजी की आराधना करो। इसके बाद पुनः गंगाजी में स्नान करके इस ब्रह्मगीरि की 11 बार परिक्रमा करो। फिर सौ घड़ों के पवित्र जल से पार्थिव शिवलिंगों को स्नान कराने से तुम्हारा उद्धार होगा।

ब्राह्मणों के कथनानुसार महर्षि गौतम वे सारे कार्य पूरे करके पत्नी के साथ पूर्णतः तल्लीन होकर भगवान शिव की आराधना करने लगे। इससे प्रसन्न हो भगवान शिव ने प्रकट होकर उनसे वर माँगने को कहा। महर्षि गौतम ने उनसे कहा- 'भगवान्‌ मैं यही चाहता हूँ कि आप मुझे गो-हत्या के पाप से मुक्त कर दें।' भगवान्‌ शिव ने कहा- 'गौतम ! तुम सर्वथा निष्पाप हो। गो-हत्या का अपराध तुम पर छल पूर्वक लगाया गया था। छल पूर्वक ऐसा करवाने वाले तुम्हारे आश्रम के ब्राह्मणों को मैं दण्ड देना चाहता हूँ।'

इस पर महर्षि गौतम ने कहा कि प्रभु! उन्हीं के निमित्त से तो मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है। अब उन्हें मेरा परमहित समझकर उन पर आप क्रोध न करें।' बहुत से ऋषियों, मुनियों और देव गणों ने वहाँ एकत्र हो गौतम की बात का अनुमोदन करते हुए भगवान्‌ शिव से सदा वहाँ निवास करने की प्रार्थना की। वे उनकी बात मानकर वहाँ त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग के नाम से स्थित हो गए। गौतमजी द्वारा लाई गई गंगाजी भी वहाँ पास में गोदावरी नाम से प्रवाहित होने लगीं। यह ज्योतिर्लिंग समस्त पुण्यों को प्रदान करने वाला है।

इस भ्रमण के समय त्र्यंबकेश्वर महाराज के पंचमुखी सोने के मुखौटे को पालकी में बैठाकर गाँव में घुमाया जाता है। फिर कुशावर्त तीर्थ स्थित घाट पर स्नान कराया जाता है। इसके बाद मुखौटे को वापस मंदिर में लाकर हीरेजड़ित स्वर्ण मुकुट पहनाया जाता है। यह पूरा दृश्य त्र्यंबक महाराज के राज्याभिषेक-सा महसूस होता है। इस यात्रा को देखना बेहद अलौकिक अनुभव है।

‘कुशावर्त तीर्थ की जन्मकथा काफी रोचक है। कहते हैं ब्रह्मगिरि पर्वत से गोदावरी नदी बार-बार लुप्त हो जाती थी। गोदावरी के पलायन को रोकने के लिए गौतम ऋषि ने एक कुशा की मदद लेकर गोदावरी को बंधन में बाँध दिया। उसके बाद से ही इस कुंड में हमेशा लबालब पानी रहता है। इस कुंड को ही कुशावर्त तीर्थ के नाम से जाना जाता है। कुंभ स्नान के समय शैव अखाड़े इसी कुंड में शाही स्नान करते हैं।’- दंत कथा

शिवरात्रि और सावन सोमवार के दिन त्र्यंबकेश्वर मंदिर में भक्तों का ताँता लगा रहता है। भक्त भोर के समय स्नान करके अपने आराध्य के दर्शन करते हैं। यहाँ कालसर्प योग और नारायण नागबलि नामक खास पूजा-अर्चना भी होती है, जिसके कारण यहाँ साल भर लोग आते रहते हैं।

त्र्यंबकेश्वर गाँव नासिक से काफी नजदीक है। नासिक पूरे देश से रेल, सड़क और वायु मार्ग से जुड़ा हुआ है। आप नासिक पहुँचकर वहाँ से त्र्यंबक के लिए बस, ऑटो या टैक्सी ले सकते हैं। टैक्सी या ऑटो लेते समय मोल-भाव का ध्यान रखें। साभार: विकिपीडिया)


होटल संस्कृति 

 होटल में नाश्ता करके हम त्रिम्ब्केश्वर की और चल पड़े. सबसे पहले हम लोग गोदावरी कुंड पहुंचे. इसे कुशावर्त तीर्थ भी कहा जाता हैं. सतुयुग में गौतम ऋषि अपनी पत्नी अहिल्या के साथ यंहा पर रहते थे. बस एक 5 मिनट मुख्य मंदिर से दूर चलना पड़ता हैं यह एक पवित्र तालाब है जिसे कुशावर्त तालाब कहा जाता है.यह वही स्थान है जहां से गोदावरी गंगा नदी मार्ग लेती है । लोगों का विश्वास है की, इस पवित्र नदी में डुबकी लेने से सब पाप धुल जाते है। गौतमऋषिजी ने एक गाय की हत्या के द्वारा एक पाप किया और इस नदी में स्नान लेने के बाद उनके पाप साफ हो गए।


श्रीमंत राव साहिब पर्नेकरजी ने इस जगह पानी के चारों ओर मंदिर का निर्माण किया जो आज हम देख रहे हैं। हॉल के सभी के अंदर की दीवारों पर विभिन्न मूर्तियों से खुदा हुआ है, और सभी कोनों में कुछ छोटे मंदिर हैं। इस तालाब का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह कुम्भ मेले के शुरुआती बिंदु है जो 12 साल में एक बार होता है। कुम्भ मेला के अवसर पर इस जगह को एक पवित्र स्नान लेने के लिए के लिए दुनियाभर से संन्यासी आते है।

नियम के अनुसार साधु संत के लिए "वैष्णव" संप्रदाय संबंधित राम कुंड, पंचवटी और "शैव" संप्रदाय के लिए यहाँ स्नान किया जाएगा। चूंकि गोदावरी (गंगा) यहां से बहती है और राम कुंड पर पहुंचती है तो दोनों पवित्र माना जाता है।(साभार: https://trambakeshwar.com/hindi/trimbakshwar.html)




गोदावरी कुंड त्रियम्ब्केश्वर 

गोदावरी कुंड में स्नान 



गोदावरी कुंड में स्नान के बाद 

गोदावरी कुंड में स्नान के बाद 




त्रियम्ब्केश्वर का इतिहास 

गोदावरी कुण्ड के किनारे शिवलिंगम

गोदावरी कुंड में स्नान के बाद हम लोग त्रिम्ब्केश्वर मंदिर की और आ गए. मकरसंक्रांति के कारण भारी भीड़ थी. लम्बी लाइन थे. तो हम भी लाइन में लग गए करीब एक डेढ़ घंटा लाइन में लग कर हम लोग ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर पाए. दर्शन करके मन तृप्त हो गया 
मंदिर के बाहर शिवाजी महाराज की मूर्ति 


मंदिर के बाहर बाज़ार व पहाडिया 
मंदिर में दर्शनों के लिए लगने वाली भीड़ 
त्रियम्बकेश्वर मंदिर


श्री त्रंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग ...
त्रिम्ब्केश्वर ज्योतिर्लिंग (साभार: NEWSPOINT)
मंदिर से दर्शन करके निकलते श्रृद्धालु 

मैं भी खिचवालू 
मंदिर का विशाल प्रांगण 





त्रिम्ब्केश्वर का इतिहास 




मंदिर का मुख्य द्वार 

मंदिर का शिखर व पहाड़ 
त्रिम्ब्केश्वर का बाज़ार 
मंदिर परिशर में थोड़ी देर रुकने के बाद. थोड़ी देर बाज़ार में घुमे. बड़ा पाँव का आनंद लिया. मात्र पांच रूपये में बड़ा पाँव उपलब्ध था. इसके बाद नासिक की और चल दिए.  रास्ते में फिर वही होटल  संस्कृति आया जिसमे नाश्ता किया था. भूख लग रही थी तो होटल पर ऑटो को रुकवा लिया. और खाना खाने के लिए चले गए.

होटल का बोर्ड 

होटल का एक और दृश्य
खाना बहुत बढ़िया बना हुआ था. १०० रूपये  की थाली थी. शुद्ध शाकाहारी खाना था. खाना खाकर नासिक की और चल दिए. आज नासिक भी घूमना था. इससे आगे का वृत्तान्त जानने के लिए क्लिक करिए."(SHIRDI TRAVELL - सूरत से शिर्डी यात्रा -५- (नासिक-NASIK)