Thursday, September 10, 2020

JODHPUR TRAVELL -5- GHANTAGHAR. घंटाघर

JODHPUR TRAVELL -5- GHANTAGHAR. घंटाघर

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किले से मैं गुलाब सागर   पर आगया.  यह एक छोटी झील हैं. जो की मेहरान गढ़ किले के नीचे बनी हुई हैं. 

गुलाब सागर का निर्माण जोधपुर के नरेश विजय सिंह की पासवान गुलाब राय ने सन 1788 में करवाया था। इससे पहले वहां प्राचीन बावड़ी थी। गुलाबराय पासवान महाराजा विजयसिंह की वैसी ही चहेती थी जैसी 18वीं शताब्दी के मराठा वीर पेशवा बाजीराव प्रथम की प्रेयसी मस्तानी थी। गुलाबराय भी मस्तानी की तरह अद्वितीय सुंदरी थीं और जोधपुर रियायत में उसका प्रभाव वैसा ही था जैसा मुगल साम्राज्य में जहांगीर के समय नूरजहां का। बुद्धिमान और सरल ह्रदय की गुलाब राय ने अपनी निर्णय शक्ति से जोधपुर में कई विकास कार्य करवाए। पानी की समस्या मिटाने के लिए परकोटे के भीतर गुलाब सागर बनवाया। उसने वैष्णव धर्म को अपना रखा था और राजा के माध्यम से पूरी रियासत में वैष्णव धर्मावलंबियों के नियम-उपनियम लागू कर रखे थे। राजमहल गुलाबराय के विरोध में था और यहां अकसर षडयंत्र बनने लगे। आखिर एक रात सरदारों ने गुलाबराय की हत्या करवा दी। गुलाब सागर को बनवाने में बेतहाशा पैसा खर्च किया गया था। इसमें पानी की आवक के लिए जोधपुर नरेश जसवंत सिंह के छोटे भाई और मारवाड़ के तत्कालीन प्रधानमंत्री सर प्रताप के निर्देश पर अंग्रेज इंजीनियर डब्ल्यू होम्स ने बालसमंद झील से नहरों का निर्माण करवाया था जिसके कारण गुलाब सागर में कभी पानी की कमी नहीं रही।

आसपास बने हैं मंदिर गुलाब सागर के दांयी तरफ लाल बाबा का भव्य वैष्णव मंदिर है जिसके कोनों में सुंदर झरोखे हैं। इसके पास रिद्धरायजी का मंदिर हैं। गुलाब सागर के बायीं तरफ राम मंदिर है जो निर्माण के बाद ही जमीन में धंस गया था इसलिए उसे धंसा हुआ मंदिर कहते हैं। पुल के दूसरी तरफ छोटा जलाशय है जिसे गुलाब सागर का बच्चा कहते हैं। इसे गुलाब राय के पुत्र शेर सिंह की मेमोरी में 1835 में करवाया गया था। इसके पीछे गुलाब राय के महल के झरोखों में की नक्काशी भी देखनेलायक है।(साभार: दैनिक भास्कर)

गुलाब सागर झील 
पाल हवेली 
यह हवेली गुलाबसागर के किनारे पर बनी हुई हैं. पुरानी और ऐतिहासिक हवेली हैं. यह पाल  हवेली १८ वी शताब्दी में  बनी हुई हैं. मेहरान गढ़ किले से यह करीब एक किलोमीटर दूर हैं. घंटा घर से दो मिनट का रास्ता हैं. यह हवेली ठाकुर उम्मेद करण जी के परिवार से सम्बंधित हैं. अब यह हवेली एक होटल हैं. इसकी ऐतिहासिक बनावट और अन्दर का रहन सहन इसे बिलकुल अलग तरह का होटल बनाता हैं. और जोधपुर के पुराने राजसी समय की याद दिलाता हैं.

पाल हवेली 
सरदार मार्केट का गेट 

पाल हवेली से मैं घूमता हुआ सरदार मार्केट की और आ गया. बहुत बड़ा और व्यस्त बाज़ार हैं. सरदार सिंह के नाम पर  ही इसका नाम सरदार मार्किट पड़ा. इसमें एक और एक विशाल दरवाजा हैं. और आगे जाकर घंटा घर हैं. इस बाज़ार में खाने पीने की बहुत सी दुकाने हैं. खरीदारी करने के लिए भी बहुत कुछ हैं. यह बाज़ार और घंटा घर मेहरानगढ़ के साये में बसा हुआ हैं. नीचे से देखने पर किला ऊपर छाया हुआ दीखता हैं.

घंटा घर जिसे क्लॉक टावर (Clock tower) के नाम से भी जाना जाता है।  इसका निर्माण जोधपुर के "सरदार सिंह" ने करवाया था। इसमें लोग खरीददारी करने के लिए आते हैं तथा यहाँ कई प्रकार की कीमती वस्तुएँ मिलती है। यहाँ पर देश विदेश के लोग आते रहते हैं।

पहले लोग घंटाघर के ऊपर नही जा सकते थे लेकिन अब मात्र १० रुपय के टिकिट से आप घंटाघर के ऊपर जाकर वहाँ से बाज़ार, शहर, मेहरानगड़ क़िले को अच्छे से देख सकते है साथ ही वहाँ की घड़ी कैसे काम करती है जान

अति व्यस्त घंटाघर का बाज़ार 

घंटाघर 


ऊपर किला नीचे बाज़ार 
सूर्यदेव के साए में घंटाघर 


घंटाघर बाज़ार और किला 
घंटाघर के आसपास कुछ खाने पीने के बाद मैं अपने होटल की और चल पड़ा. शाम ढलने लगी थी. मैं भी थक गया था. आराम के मूड में था. होटल में जाकर के एक घंटा आराम किया.  फिर होटल की छत पर जाकर के ऊपर से जोधपुर नगर और किले के कुछ फोटो लिए. 

MEHRANGARH FORTE IN NIGHT - JODHPUR 

SOJATI GATE - JODHPUR 

JODHPUR CITY IN NIGHT 

MEHRAN GARH IN NIGHT 

ANOTHER VIEW SOJATI GATE - JODHPUR 

फोटो लेने के बाद मैं होटल से नीचे सोजती गेट पर आ गया. यंहा पर एक गणेश जी का मंदिर बना हुआ हैं. और आसपास खाने पीने के लिए बहुत से स्टाल लगते हैं. हर तरह का फ़ास्ट फ़ूड और सैंडविच यंहा पर उपलब्ध हैं. कुछ पेट पूजा करके और इधर उधर घूम कर के मैं अपने कमरे में आकर लम्बी तान कर सो गया. 

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Sunday, August 30, 2020

JODHPUR TRAVELL -4- JASWANT THADA, जसवंत थड़ा

JODHPUR TRAVELL -4- JASWANT THADA, जसवंत थड़ा

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किले से निकलकर मैं पैदल पैदल जसवंत थड़े की और चल पड़ा. करीब १५-२० मिनट लगे होगे. दोपहर की गर्मी थी. पसीने से तर  हो गया. प्यास लगने लगी थी. पानी दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रहा था.जब इमारत के पास पहुंचा तो पानी का कूलर लगा हुआ देखा, छक कर पानी पीया. इस इमारत को देखने के लिए कोई टिकट नहीं लगता हैं. इस इमारत से थोडा पहले ही महाराजा जसवंत सिंह की विशाल घोड़े पर सवार मूर्ति लगी हुई हैं. इस इमारत का माहौल बहुत ही शांत और सुन्दर हैं. इसे जोधपुर का ताजमहल भी कहा जाता हैं. 

किले की तलहटी में एक ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है जसवंत थड़ा। किले के रास्ते में एक शानदार इमारत। कभी यह केवल मोक्षधाम के रूप में ही जाना जाता था।

लेकिन अब यहां पर्यटक खूब आते हैं। यह भवन लाल घोटू पत्थर के चबूतरे पर बनाया गया है। यहां बना बगीचा और फव्वारा बहुत ही मनोरम लगता है। जोधपुर राजघराना सूर्यवंशी रहा है संगमरमर निर्मित जसवंत थड़े में सूर्य किरणें पत्थर को चीरती हुई अंदर तक आती हैं तो नेत्ररंजक दृश्य नजर आता है। इसमें अंदर जोधपुर नरेशों की वंशावलियों के आकर्षक  चित्र बनाए गए हैं।

महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय (1837-1895 ई.)की स्मृति में बने इस जसवन्त थड़े में महाराजा जसवन्तसिंह द्वितीय से लेकर महाराजा हनवंतसिंह तक की सफेद पत्थर से निर्मित छतरियां बनी हुई हैं। साथ ही महारानियों के स्मारक भी देखने लायक हैं।

मोक्ष के धाम जसवंत थड़ा का आज भी पुराना वैभव उसी रूप में कायम है जिस कला रूप में यह बना था। इमारत के पास ही "तखतसिंहोत परिवार" के सदस्यों की छत्तरियां भी बनी हुई हैं।

यह महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय के वारिस महाराजा सरदारसिंह ने बनवाया था। महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय से पहले जोधपुर के नरेशों का मंडोर में अंतिम संस्कार होता था। इनके उलट महाराजा जसवंतसिंह की मर्जी के मुताबिक उनका अंतिम संस्कार किले की तलहटी में स्थित देवकुंड के किनारे पर किया गया । तब से जोधपुर नरेशों की इसी जगह पर अंत्येष्टि की जाती है। यह सफेद पत्थरों से बनी एक कलात्मक खूबसूरत इमारत है।

नई कहानी सूरज की रश्मियों की छुअन से निखरते इसके सफेद झरोखे और कंगूरे स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं। यह इमारत चांदनी रात में बहुत खूबसूरत दिखाई पड़ती है।

स्काउट गाइड, एनसीसी, एनएसएस, स्कूल कॉलेज के भ्रमण दल, देसी विदेशी सैलानी इसे देखने आते हैं। जोधपुर रिफ के आयोजन के दौरान विख्यात गायकों की आवाज में अलसभोर और संध्या आरती के समय कबीर वाणी माहौल में भक्ति रस घुलता है।

महाराजा सरदारसिंह ने 1900 ई. में नरेशों की तस्वीरें लगीं : सन 1921 ई. के सितम्बर माह में कुल खर्च : 2 लाख 84 हजार678 रूपए बुद्धमल और रहीमबख्श आर्किटेक्ट इसका नक्शा मुंशी  सुखलाल कायस्थ ने बनाया और 1 जनवरी 1904 को रेजीडेन्ट जेनिन ने यह थड़ा बनाने की मंजूरी दी थी। जसवंत थड़ा के बुद्धमल और रहीमबख्श आर्किटेक्ट थे। इसके निर्माण में कलात्मकता का पूरा ध्यान रखा गया है।(  साभार: पत्रिका )

जसवंत थड़ा और झील 
महाराजा जसवंत सिंह की मूर्ति

जसवंत थड़ा से थोड़ी ही पहले एक चट्टान पर राजा जसवंत सिंह की घोड़े पर सवार मूर्ति लगी हुई हैं.
जसवंत थड़े से किला 
राव जोधा डेजर्ट पार्क 
जसवंत थड़े का प्रवेश द्वार 
राजाओं की छतरी 

किला और नगर - JODHPUR
रानियों की छतरिया


जसवंत थड़ा 
और ये मै 
सुन्दर निर्माण 
सामने का दृश्य 
एक और दृश्य 
खुबसूरत जसवंत थडा, JASWANT THADA - JODHPUR 
अन्दर का दृश्य 

महाराजा का समाधि स्थल 
अन्दर से बाहर का दृश्य 
मारवाड़ के राठौड़ के बारे में जानकारी 

एक पुराना किला राव जोधा पार्क में 
पुराना किला 
जसवंत थड़े के पास टावर 
पीछे का दृश्य 
सुन्दर भवन 
झील का एक दृश्य 
JASWANT TADA - JODHPUR
एक कलाकार संगीत वाद्य  बजाते हुए 
दूर से दिखता महल 
दोपहर ढलने लगी थी करीब साढ़े तीन बज चुके थे. अब नीचे नगर की और चलना था. यंहा से कोई वाहन नहीं मिलता हैं. या तो अपना वाहन हो या फिर किसी से लिफ्ट लो. थोड़ी देर प्रतीक्षा के बाद एक छोटा हाथी आता हुआ दिखाई दिया. मैंने उसे हाथ दिया तो उसने रोक लिया. वह बंदा वाटर कैम्फर  सप्लाई करता था. उसने मुझे बिठा लिया. वह नीचे घंटाघर की और जा रहा था. इससे आगे का वृत्तान्त पढने के लिए क्लिक करे (JODHPUR TRAVELL -5- GHANTAGHAR. घंटाघर)